सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।
अगर आपको हवाई यात्रा करनी है और आपको पता चले कि 3000 रुपये के न्यूनतम किराए पर सिर्फ दो सीटें खालीहैं, तो आप क्या करेंगे? निश्चित ही आपका निर्णय यह होगा कि इससे पहले 3000 रुपये वाली ये टिकटें बिक जाएं, मैं इन्हें ले लेता हूँ। एयरलाइन कंपनी व्यक्ति के इस स्वभाव से खासा लाभ उठाती है।
इस स्थिति का विश्लेषण करें, तो यह एक तथ्य को दर्शाती है। यह कि जब व्यक्ति को किसी वस्तु के छूट जाने या कमी का अहसास कराया जाता है, तब वह उसी समय अपनी निष्क्रियता को त्याग कर उसे पाने के लिए सक्रिय हो जाता है।
ठीक ऐसे ही, यह मानव तन जो हमें मिला है, बहुत ही दुर्लभ और क्षणभंगुर है।महापुरुषों ने कहा--
"यह अवसर दुर्लभ महा, नित पाया नहीं जाए।
अब कि चूके चूक है, फिर पछतावा रह जाए।।"
पर अफसोस! मानव तन की इस दुर्लभता से हम अपरिचित हैं। इसलिए बस लगे रहते हैं, सांसारिक धन को अर्जित करने में। भोग विलासिता भरा जीवन जीने में। पर जब हमारे जीवन में पूर्ण गुरु आते हैं और हमें ब्रह्मज्ञान की दीक्षा प्रदान करते हैं, तब हमें इस सत्यता का पता चलता है।तब हमें सुधि आती है कि हम जिन श्वासों को व्यर्थ गवां रहे हैं, वे कितनी दुर्लभ हैं! फिर हम जीवन के प्रति गंभीर होते हैं। उसके वास्तविक लक्ष्य को पाने का हर संभव प्रयास करने में जुट जाते हैं और अंततः सफल भी होते हैं।
**ओम् श्री आशुतोषाय नम:**
"श्री रमेश जी"
