दिव्य धाम आश्रम, दिल्ली में दिव्य मासिक आध्यात्मिक कार्यक्रम बना - भक्ति, सकारात्मकता और आंतरिक जागरण की एक संगीतमय गूंज।

 

                          कार्यक्रम का विहंगम दृश्य

दिल्ली स्थित दिव्य धाम आश्रम की पावन भूमि पर दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान (डीजेजेएस) द्वारा आयोजित मासिक आध्यात्मिक कार्यक्रम ने एक बार फिर हजारों साधकों के हृदयों को दिव्य प्रकाश से आलोकित किया। यह आयोजन मात्र एक सभा नहीं, बल्कि एक गहन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र सिद्ध हुआ। जिसने श्रद्धालुओं को दिव्य ऊर्जा, सकारात्मकता और आत्म-जागरण के मार्ग पर आगे बढ़ने का नया संकल्प प्रदान किया।

भक्ति संगीत आरंभ होते ही, संपूर्ण वातावरण पवित्रता, शांति और दिव्य स्पंदन से भर उठा। कहा भी गया है कि संतों का संग जीवन में विवेक और ज्ञान का संचार करता है। साधकों ने ब्रह्मज्ञान की ध्यान साधना का अभ्यास कर उसे सशक्त किया, ताकि वे सांसारिक जीवन की चुनौतियों का सामना दृढ़ता से कर सकें।

कार्यक्रम की शुरुआत भजनों की एक श्रंखला से हुई, जिनकी प्रत्येक स्वर लहरियों में समर्पण और परमात्मा के प्रति प्रेम की सुगंध समाई थी। इन मधुर धुनों ने ऐसा पवित्र वातावरण निर्मित किया, जिसने सभी के मन और आत्मा को सहज ही परम चेतना की ओर उन्मुख कर दिया। सामूहिक गायन केवल संगीत नहीं था, यह प्रार्थना की सजीव अभिव्यक्ति थी, जहाँ व्यक्तिगत सीमाएँ विलीन हो गईं और सामूहिक चेतना ईश्वर भक्ति में लीन नज़र आई। 

दिव्य गुरु श्री आशुतोष महाराज जी (संस्थापक एवं संचालक, डीजेजेएस) के प्रचारक शिष्यों ने प्रवचनों द्वारा बताया कि आधुनिक जीवन की तेज रफ्तार व जिम्मेदारियों के बीच प्रायः व्यक्ति शांति व संतोष की तलाश में तड़पता है। ऐसे क्षणों में मन शांति चाहता है और तब हृदय की गहराइयों से प्रार्थना स्वतः प्रस्फुटित होती है। तब सतगुरु जीवन में दिव्य पथप्रदर्शक के रूप में प्रकट होकर उस शाश्वत सत्य के ज्ञान- "ब्रह्मज्ञान" को प्रदान करते हैं, जो स्थायी रूप से आनंद की प्यास को शांत कर सकता है।

गुरु कृपा से एक साधक ध्यान में प्रवृत्त होता है और उसकी दृष्टि भीतर की ओर मुड़ती है। जैसे-जैसे वे अपने अंतर्मन की गहरायों में उतरता है, उसके विचार शुद्ध होने लगते हैं, चंचलता शांत होती है और सांसारिक बोझ की तरंगें धीरे-धीरे विलीन होती जाती हैं। प्रवक्ताओं ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल पूर्ण गुरु ही ब्रह्मज्ञान प्रदान कर सकते हैं, जिसके माध्यम से साधक यह अनुभव करता है कि ईश्वर कहीं बाहर नहीं, बल्कि उसके भीतर ही निवास करता है। यह अनुभूति जीवन का महत्वपूर्ण मोड़ बन जाती है, जहाँ ध्यान शांति, शक्ति और स्पष्टता की कुंजी बन जाता है।

सत्संग प्रवचनों द्वारा यह संदेश भी दिया गया कि ध्यान सांसारिक कर्तव्यों से पलायन नहीं, बल्कि आनंद और संतुलन के साथ जीवन निभाने का ऊर्जा स्रोत है। जब चेतना प्रभु की ओर उन्मुख होती है, तो चिंताएँ स्वतः दूर होने लगती हैं। जीवन की चुनौतियों का सामना सहजता एवं धैर्य से किया जा सकता है। प्रचारक शिष्यों ने श्रद्धालुओं से आग्रह किया कि वे ध्यान को अपने दैनिक जीवन का अभिन्न अंग बनाएं। साथ ही, उन्हें आश्वस्त भी किया कि ब्रह्मज्ञान ही जीवन की अनिश्चितताओं के बीच भी मन को शांत, संतुलित और स्थिर बनाए रखने का एकमात्र उपाय है।

कार्यक्रम का समापन सामूहिक ध्यान से हुआ, जिसमें हजारों साधक ईश्वर से एकरूप नज़र आए। उस क्षण सामूहिक ऊर्जा व सम्पूर्ण परिसर में शांति का एक सागर उमड़ता जान पड़ा। ध्यान सत्र के बाद, साधकों ने दृढ़ निश्चय किया कि वे आध्यात्मिक पथ पर अडिग रहेंगे और अपने दैनिक जीवन में दिव्य ज्ञान का अनुसरण करेंगे।

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