*मन का स्वभाव है कि वह विषय विकारों को नहीं छोड़ता और विषयों का स्वभाव है कि वे मन को नहीं छोड़ते।**

 सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।

जब चील अपने पंजों में किसी शिकार को दबोच लेती है, तो उसकी गिरफ्त से शिकार को छुड़ा पाना मुश्किल ही नहीं, लगभग असंभव होता है। चील इस पकड़ को बनाते समय, अणु जितनी उर्जा भी व्यर्थ नहीं गंवाती। उसकी सारी ऊर्जा शत प्रतिशत केंद्रित होती है, पकड़ को अचूक तथा अटूट बनाने में। पंजों को पहले पूरा आगे तक फैलाते हुए, वह शिकार को फांसती है। फिर उसके इर्द गिर्द पंजों को घुमाकर उसे कसकर पकड़ लेती है। यह प्रक्रिया इतनी स्फूर्ति तथा निपुणता से होती है कि त्रुटि एवं विफलता का कोई स्थान ही नहीं होता। ड्रोन इंजीनियर भी मशीनों में प्रयोग की जाने वाले Clutch/Claw हेतु अब चील के पंजों की चाल समझ रहे हैं, ताकि इस पर आधारित तकनीक मशीनों में उपयोग की जा सके।

    हम साधक भी इसमें छिपा संदेश अपने लिए प्रयोग में ला सकते हैं। जैसे चील शिकार को पकड़ने के लिए हर पल सतर्क रहती है। एक भी क्षण जाया नहीं करती। ठीक इसी प्रकार साधक को भी सदैव सतर्क रहना चाहिए, ताकि संशय, नकारात्मकता, अविश्वास, अश्रद्धा इत्यादि उसके मन में घुसपैठ न कर पाएं।कबीरदास जी मन और विषय विकारों के संदर्भ में कहते हैं---

"मन नहि छाड़ै विषय रस, विषय ना मन को छारि।

इनका येहि सुभाव है, पुरि लागि आरि।।"

    यानि मन का स्वभाव है कि वह विषय विकारों को नहीं छोड़ता और विषयों का स्वभाव है कि वे मन को नहीं छोड़ते। बार बार एक दूसरे को पकड़ लेते हैं।

    किंतु एक साधक को चाहिए कि वह सतर्क रहे और जैसे ही मन विषय विकारों की ओर प्रवृत्त हो, इसे कसकर थाम ले। इतना कि इसके छूटने की या गलत राह पर बढ़ने की कोई गुंजाइश ही न रहे।

**ओम् श्री आशुतोषाय नमः**

"श्री रमेश जी"

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