सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।
आपने कभी चिड़िया को अपना घोंसला बनाते हुए देखा है? थकना, रुकना, हारना, आलस करना - ये शब्द उसके शब्दकोश में कहीं स्थान नहीं रखते। वह सुबह अपने घर को बनाना शुरु करती है। पहला तिनका चुनकर लाती है।फिर दूसरा... फिर तीसरा... एक के बाद एक, तथा एक के साथ एक तिनके को बुनती है- वह भी पूरे धैर्य के साथ। कई बार उन तिनकों को अपनी चोंच से अंदर बाहर करती है। सुबह से शाम हो जाती है, पर न तो चिड़िया के प्रयास थमते हैं और न ही उत्साह... जब तक घोंसला पूरा बन नहीं जाता। उसकी खूबी यह है कि वह आखिरी तिनका बुनते वक्त भी उतनी ही उत्साहित होती है, जितनी पहले तिनके के समय थी।
साधकों! इसमें छिपा सूत्र वही है, जिसे हमने *श्री गुरुदेव आशुतोष महाराज जी* के मुखारविंद से भी अनेकों बार सुना है-- "चरैवेति-चरैवेति.. चलते रहो.. चलते रहो...। "इस चिड़िया के समान, बिना थके, बिना रुके, बिना हारे, बिना टूटे... अनवरत, निरंतर आगे बढ़ते रहो... जब तक कि अपनी मंज़िल को न पा लो।
ऐतरेय ब्राह्मण (अध्याय 3) के मन्त्र से भी यही प्रेरणा मिलती है----
"आस्ते भग आसींस्योर्ध्वस्तिष्ठति तिष्ठतः
शेते निपद्यमानस्य चराती चरतो भगश चरैवेति
आसिनस्य भग आस्ते, तिष्ठतः उर्ध्व: तिष्ठति
निपद्यमानस्य शेते, चरतः भागः चराती, चर एव इति।।"
अर्थात जो मनुष्य बैठा रहता है, उसका भाग्य भी बैठ जाता है, यानी रुक जाता है। जो उठ खड़ा होता है, उसका भाग्य भी उसी प्रकार उठ जाता है। जो सोया रहता है, उसका भाग्य भी सो जाता है। और जो चलने लग जाता है अर्थात सक्रिय हो जाता है उसका भाग्य भी फिर सक्रिय हो जाता है। इसलिए चलते रहो... चलते रहो।
**ओम् श्री आशुतोषाय नमः*
"श्री रमेश जी”
