सर्व श्री आशुतोष महाराज जी की कृपा वर्षा
आज के दौर में मनुष्य की भी यही दशा है। वह स्वयं को ऐसी बहुत सी रीतियों व परंपराओं से घिरा हुआ पता है, जिनके पीछे ना तो कोई तर्क है और ना ही उसका निजी अनुभव। परंतु फिर भी वह निरंतर उन रीतियों का अनुसरण करता है। उन्हें ज्यों का त्यों दोहराता है। यदि कोई उसकी परंपराओं पर प्रश्न खड़े करें 'भई! ऐसा क्यों करते हो?; तो अक्सर कहता है-'हमारे बड़े- बुजुर्ग और पूर्वज करते आए हैं। इसलिए हम भी ऐसा कर रहे हैं।'आखिर क्यों हम यह जानने तक का प्रयास नहीं करते हैं कि जिन परंपराओं को हम निरंतर पालन कर रहे हैं, उनकी शुरुआत किन परिस्थितियों में हुई थी? उन रिवाजों की उत्पत्ति के पीछे कारण क्या था? वे अस्तित्व में क्यों आए? और तो और, हम यह तक नहीं सोचते कि वे परंपराएं आज के दौर में सामयिक रूप से कितनी प्रासंगिक है! कारगर है भी या नहीं? मतलब कि हम भी नकलची बंदरों की श्रेणी में आकर कर्मकांड करने के लिए खड़े हो जाते हैं। कुछ अज्ञानीऔर अहंकारी किस्म के मनुष्य तीर्थ स्थलों पर स्नान करने के लिए धक्का-मुक्की करते हैं ताकि नहाने से मोक्ष की प्राप्ति या ईश्वर की प्राप्ति हो जाएंगी।
पर... ध्यान रखिए, मनुष्य नकल करने वाला बंदर नहीं है। वह तो विवेकवान जीव है।
तभी तो हमारे संत महापुरुषों ने मानव को इस वानरी वृत्ति का पूर्णत: खंडन किया । संत कबीर दास जी स्पष्ट कहते हैं-
*नहाये धोये क्या हुआ, जो मन मैल न जाए।*
*मीन सदा जल में रहे, धोये बास न जाए।।*
जिसका अर्थ है कि बाहरी स्वच्छता (स्नान) व्यर्थ है यदि आंतरिक मन में पाप, द्वेष या कपट भरा है। मछली का उदाहरण देते हुए कबीर जी कहते हैं कि वह हमेशा पानी में रहती है, फिर भी उसे बदबू नहीं जाती।
कहने का अभिप्राय है वास्तविक भक्ति के लिए सर्वप्रथम हमें सद्गुरु के शरण में जाना होगा । ब्रह्मज्ञान के द्वारा ईश्वर का साक्षात्कार करना होगा । हमें ईश्वर का दर्शन करना होगा। ईश्वर का निजी अनुभव पाना होगा। इस निजी अनुभव के आधार पर ही हम शाश्वत भक्ति में स्थित होंगे यही मनुष्य के जीवन का वास्तविक सार है।
ॐ श्री आशुतोषाय नमः
श्री सियाबिहारी जी ✍️
