सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।
बहुत लोग ऐसे होते हैं, जो ईश्वर को अपनी बुद्धि के आधार पर, तर्क वितर्क से समझने का प्रयास करते हैं। परंतु जब एक सांसारिक विषय को तर्क वितर्क से सुलझाना मुश्किल है, फिर वह ईश्वर जिसके संबंध में कहा गया _ "राम अतर्क्य बुद्धि मन वाणी "_ उसे तर्क वितर्क के आधार पर नकारना अथवा सिद्ध करना तो सर्वथा असंभव है। तभी महाभारत के वन पर्व में स्पष्ट लिख दिया गया
"तर्कोप्रतिष्ठ: श्रुतयो विभिन्ना नैको ऋषिर्यस्य वच: प्रमाणम्।"
यानि उस ईश्वर को तर्कों से प्रतिष्ठित नहीं किया जा सकता। न ही उसे विभिन्न श्रुतियों व शास्त्रों की प्रकाण्ड विद्वत्ता से हासिल किया जा सकता है।
तो फिर किस प्रकार ईश्वर को समझा व जाना जा सकता है? महाभारत के श्लोक स्पष्ट करती है _
"धर्मस्य तत्वं निहितं गुहायाम्।
महाजनो येन गत: स पन्था:।।"
अर्थात जिस रास्ते से होकर, ज्ञानीजन गुजरे, उसी मार्ग पर चलकर धर्म के गुह्यतम तत्व यानि ईश्वर को जाना जा सकता है।
ज्ञानीजन किस मार्ग का अनुसरण करते हैं?
मुण्डकोपनिषद् में कहा गया है _
"परीक्ष्य लोकान् कर्मचितान् ब्राह्मणो
निर्वेदमायान्नास्त्यकृत: कृतेन।
तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत्
समित्पाणि: श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठम्।।"
अर्थात यज्ञादि कर्म तथा अन्य मार्गों द्वारा उस शाश्वत की प्राप्ति नहीं हो सकती। ईश्वर को पाने के लिए श्रोत्रिय ब्रह्म निष्ठ गुरु की शरण में जाना अनिवार्य है।
योगानंद परमहंस कहते हैं_ "एक चूजा जबतक अंडे में कैद होता है, तबतक वह अंडा ही उसका संसार होता है। पर जब अंडा टूटता है, तो वह बाहर की दुनिया में प्रवेश कर जाता है। आज मनुष्य भी अज्ञानता के आवरण में कैद है। चूजे का आवरण जब हटता है, तो वह बाहर के संसार को देखता है। परंतु जब सद्गुरु की कृपा से यह अज्ञानता का परदा हटता है, तो हम भीतर के जगत में प्रवेश करते हैं _ जो बेहद दिव्य है, अलौकिक है।"
यूं तो ईश्वर हमारे भीतर ही मौजूद है। परंतु मायावी शोर के कारण हम उससे संपर्क नहीं बिठा पाते। सद्गुरु ब्रह्म ज्ञान देकर माया के आवरण को हटा देते हैं, जिसके बाद हम ईश्वर से मिल पाते हैं।
सारांशत: ईश्वर की जीवन में सार्थकता भी है और महत्ता भी। जब हम एक ब्रह्मनिष्ठ सद्गुरु की शरणागत होते हैं, तब वे हमारी अज्ञानता के परदे को हटा देते हैं। हमें हमारे अंतर्घट में ईश्वर के अलौकिक स्वरूप - दिव्य प्रकाश का दर्शन करा देते हैं। उसके बाद ही हम जीवन में वास्तविक सुख व शांति का अनुभव करते हैं।
**ओम् श्री आशुतोषाय नम:**
"श्री रमेश जी"
