*शिव के डमरु की डम-डम से 'संस्कृत भाषा की रचना'!*

        सर्व श्री आशुतोष महाराज जी की कृपा वर्षा

यह सर्वविदित है कि ऋषि पाणिनि संस्कृत भाषा के जनक हैं। उन्होंने संस्कृत व्याकरण के सभी नियमों का उल्लेख अपनी रचना 'अष्टाध्यायी' मैं अंकित किया है। पर गौर करने वाली बात है कि इसका सारा श्रेय डमरू धारी महादेव को देते हैं। 'अष्टाध्यायी' एक श्लोक इस बात की पुष्टि करता है-

*नृत्तावसाने नटराजराजो ननाद ढक्का़ंनवपंचवारम।* 

*शिवसूत्रजालम।।*

अर्थात तांडव के समाप्ति के पश्चात भगवान आशुतोष ने चौदह बार डमरू बजाया, जिसमें 14 सूत्रों की जाल (वर्णमाला) का प्राकट्य हुआ। 

(1.अ इ उ ण्।  2.ऋ लृ क्। 3.ए ओ ड्। 4.ऐ औ च्। 5. ह य व र ट्। 6.ल ण् । 7. म ड. म न म्। 8.झ भ  । 9.घ  ढ ष्। 10.ज ब ग ड द श् । 11.ख फ छ ठ थ च क त व्। 12.क प य् ।13. श ष स र् । 14. ह ल ।)

आपको बता दे कि ऊपर लिखित सूत्र डमरू से निकली वे 14 ध्वनियां हैं जो ऋषि पाणिनि ने महादेव की कृपा से अपने अंतर घट में सुनी। तत्पश्चात इन्हीं की मदद से उन्होंने संस्कृत की संपूर्ण वर्णमाला उद्धत की। महादेव के डमरू से प्रस्फुटित इस संस्कृत भाषा में इतनी अनूठी 'रचना शक्ति' व्याप्त है?  इस रहस्य का सन 1960 के दशक में संपूर्ण विश्व को पता चला। इस उद्घाटन  का श्रेय जाता है डॉक्टर हंस जान्नी को। अपने अथक प्रयासों के अंतर्गत उन्होंने क्रिस्टल ओसिलेटर(एक प्रकार का जनरेटर, जो स्पंदन पैदा करता है) ।प्रयोग के इस उपकरण का नाम उन्होंने 'टोनोस्कोप' रखा। टोनोस्कोप से पता चला की संस्कृत भाषा में सृजनात्मक शक्ति है।

संस्कृत कि अनुपम रचना शक्ति का उद्गम स्रोत, शिव का डमरू भी है। सरल शब्दों में कहे तो, 'डमरू' से उत्पन्न हुई संस्कृत। उक्त शोध से सिद्ध हुई 'संस्कृत में रचनात्मक शक्ति 'है! बस शर्त यही है कि आप एक पूर्ण गुरु से ब्रह्मज्ञान में दीक्षित हो। फिर उसी दीक्षा के द्वारा ब्राह्मनाद आपके अंतर्गत में प्रकट हो पाएगा। आप ब्रह्मनाद को ध्यान की शाश्वत विधि के द्वारा श्रवण करने में सक्षम हो पाएंगे। 

सारत: भगवान शिव का डमरू कोई प्रलय या विनाश की ओर इशारा नहीं करता। यह अंतर्जगत का ब्राह्मनाद है! यह प्रतीक है शुभ व सूक्ष्म, सृजन, नवीनीकरण, विकास व उत्पत्ति का।

ॐ श्रीं आशुतोषाय नमः 

श्री सियाबिहारी जी ✍️

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