**जागृत आत्मा सत्यों का भी सत्य है और श्वास भी सत्य है। अत: अंतरात्मा ही श्वास का सत्य है।**

 सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।

जब हम गहरी साँसों पर आधारित व्यायाम या प्राणायाम करते हैं, तो आक्सीजन का अनुपात बढ़ जाता है। आक्सीजन की मात्रा सही होते ही, शरीर के अंदर की सारी क्रिया प्रणाली सुचारू रूप से चलने लगती है। नतीजतन, हम तनाव रहित महसूस करते हैं।

    परंतु यह भी सत्य है कि ये श्वास प्रक्रियाएं या प्राणायाम हमें स्थायी रूप से शांति और सुकून देने में असमर्थ हैं। साथ ही, ये हमें आनंद के उस स्तर तक ले जाने में भी कारगर नहीं है, जिसकी प्राप्ति को सभी महा पुरुषों ने मानव जीवन का परम लक्ष्य बताया है। लेकिन आज बहुत से लोग इन श्वास प्रक्रियाओं को ही 'ध्यान' मान लेते हैं। जबकि वास्तव में, ये श्वास क्रियाएँ ध्यान नहीं। बल्कि ध्यान की पराकाष्ठा तक पहुँचने के लिए उत्प्रेरक के समान है।

    महर्षि पतंजलि अपने योगसूत्र में लिखते हैं - 'साँस को अंदर लेना, बाहर फेंकना व रोकना - यह प्राणायाम है। इसकी मदद से श्वास नियंत्रित, दीर्घ व गहरी बनती है।' परंतु 'वह प्रक्रिया जो श्वास के अंदर बाहर आने जाने या रुकने से भी परे है, वह तुरीय अवस्था या जागृत चेतना का स्तर कहलाता है। उस अवस्था में जिस प्राणशक्ति का शरीर में संचार होता है, उसे श्वास प्रक्रिया का श्रेष्ठतम, सबसे उत्तम स्तर माना गया है।'  वे मात्र फेफड़ों के माध्यम से आने जाने वाली आक्सीजन कार्बनडाईआक्साइड से नहीं बनतीं। बल्कि वे इस सृष्टि की सूक्ष्मतम तरंग - आदिनाम के साथ लयबद्ध होती हैं। यह आदिनाम व्यक्ति के भीतर तब प्रकट होता है, जब उसकी आत्मा जागृत हो जाती है। इस तथ्य की पुष्टि समस्त धर्मग्रंथ करते हैं - -

_ श्वास अंतरात्मा से उत्पन्न होती है। (प्रश्नोपनिषद 3.3.1)                           

                            _अंतरात्मा श्वासों की भी श्वास है। (केनोपनिषद् 1.2) 

                                     _ उस (जागृत आत्मा) से ही जीवन का स्पंदन प्रस्फुटित होता है। (मुण्डकोपनिषद्, 2.1.3)

उपनिषद आगे कहता है - '(जागृत) आत्मा सत्यों का भी सत्य है और श्वास भी सत्य है। अत:अंतरात्मा ही श्वास का सत्य है।'

    संतों महापुरुषों ने सदा मानव जाति को श्वासों की इसी गहराई और महीनता का अनुभव प्राप्त करने के लिए प्रेरित किया है।

**ओम् श्री आशुतोषाय नम :**

"श्री रमेश जी"

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