सर्व श्री आशुतोष महाराज जी की कृपा वर्षा
वैदिक युग में ऋषिगण 'वेद मंत्रोच्चारण ' पद्धति से वातावरण में शुद्धता का संचार किया करते थे। वे प्राण -बल, मनोबल ,तेज -सद्चरित्र एवं आध्यात्मिक प्रगति को भी प्राप्त करते थे। साथ ही, प्राकृतिक संतुलन, आरोग्य ,आयु -बुद्धि आदि लाभो को भी सहज ही पा लेते थे। परंतु वर्तमान में प्रयास करने पर भी वेद -मत्रों के उपरोक्त लाभ नहीं मिल पाते हैं। कारण है, ब्रह्मज्ञान का अभाव।
मंत्रों का उच्चारण जब एक निस्वार्थी ब्रह्मज्ञानी साधक द्वारा होता है, तभी इसे सर्वोच्च स्तरीय परिवर्तन लाये जा सकते हैं। ब्रह्मज्ञानी वह है, जिसने पूर्ण गुरु से दीक्षित होकर ब्रह्म के प्रकाश (ज्योति) का साक्षात दर्शन किया हो और गुरु आज्ञा को धारण कर ब्रह्मज्ञान के पथ पर दृढ़ता से चल रहा हो। ऐसे ब्रह्मज्ञानी साधक जब मंत्रों का शुद्ध उच्चारण करते हैं, उनसे उत्पन्न होने वाली ध्वनि तरंगों का प्रभाव सत्गुना बढ़ जाता है। इसी कारण से वैदिक काल में आदिनाम के सुक्ष्म स्पंदन से जुड़े तत्वज्ञानी साधकों द्वारा किए गए मंत्रोच्चारण को ही विशेष सम्मान दिया जाता था।
ॐ श्रीं आशुतोषाय नमः
श्री सियाबिहारी जी ✍️
