सत्य तीन प्रकार का होता है --
१-प्रातिभासिक सत्य --ऐसा सत्य होता नहीं है, लेकिन आभास होता है, मालूम
होता है कि यह है। जैसे मृग मरीचिका।
ग्रीष्मकाल में चिलचिलाती धूप मृगों/
पशुओं को दूरस्थ जल मालूम होती है और वे अपनी प्यास मिटाने केलिए उधर
दौड़ते हैं, लेकिन दौड़ते -दौडते थक जाते
हैं, परंतु पानी नहीं पाते और प्यासे रह
जाते हैं।
२-व्यावहारिक सत्य--ऐसा सत्य भी
असल में होता नहीं है, लेकिन उससे हमारा व्यवहार संभव होता है, चलता है,
अतः हम उसे सत्य मानते हैं, लेकिन उसे
व्यावहारिक सत्य मानते और कहते हैं।
जैसे नदी, जंगल, मकान, मनुष्य, पक्षी,
खाना,जाना, सुख -दु:ख, लाभ-हानि यश-अपयश आदि -आदि।
पारमार्थिक सत्य--यही असल सत्य है।
यह त्रैकालिक अपरिवर्तनीय, सर्वव्यापी,
अरुप,सदसद्,नाप,नाम,आकार, गोचर आदि से परे है।उसे अपनी सुविधानुसार
मानव गाड, ऊर्जा, आदिशक्ति आदि
पुरुष, ब्रह्म, साकार ब्रह्म, निराकार ब्रह्म,
भगवान्, ईश्वर, परमात्मा, विश्व कर्मा,
अल्लाह आदि मानकर उनकी पूजा करताहै और अपना अभीष्ट प्राप्त करता
है।
प्रस्तुति कर्ता
डां०हनुमानप्रसादचौबे
गोरखपुर ।
