**गुरु की पूर्णता और गुरुता इसी में है कि वे अपने शिष्य को प्रयोगात्मक रूप से ईश्वर का साक्षात दर्शन और अनुभव कराएं।**

सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।

एक बाहरी जगत है, जिसमें हम रहते हैं। पर संतों के अनुसार हमारे मस्तक के भीतर एक सूक्ष्म 'अंतर्जगत' है। संत चरणदास जी बताते हैं -

"साधो अजब नगर अधिकारी।...

स्रवण बिना बहु बानी सुनिये,

बिन जिभ्या स्वर गावैं।

बिना नैन जहँ अचरज दीखै बिना अंग लिपटावैं।।"

अर्थात, साधो, मेरे भीतर (मस्तक में) एक अजब नगर है। इसमें बिना कानों के शब्द धुनकारें सुनती हैं। बिना जिह्वा के स्वर गाए जाते हैं। बिना आँखों के अचरज भरे अपूर्व दृश्य दिखते हैं। बिना अंगों के ही ईश्वर से मन लिपट (जुड़) जाता है।

फिर कहते हैं -

'गुरु सुकदेव करी जब किरपा अनुभौ बुद्धि प्रकास।'

_ जब मेरे गुरु शुकदेव ने कृपा की, तब इस अद्भुत नगर (अंतर्जगत) का अनुभव मेरी बुद्धि में प्रकाशित हुआ।

  जब पूर्ण गुरु हमें ब्रह्मज्ञान की दीक्षा देते हैं, उसी समय हमारे मस्तक में आज्ञा चक्र से सहस्रार चक्र तक व्याप्त सूक्ष्म अंतर्जगत को प्रकट कर देते हैं। अंतर्जगत का कपाट (द्वार) को ही पौराणिक ग्रंथों में 'दिव्य दृष्टि', 'तृतीय नेत्र', 'शिव नेत्र', 'दिव्य चक्षु', 'दशम द्वार' आदि नामों से सम्बोधित किया गया है। अंतर्जगत का यह दशम द्वार या दिव्य नेत्र हमारी भौहों के बीच त्रिकुटि स्थल पर सूक्ष्म रूप में स्थित होता है।

    ब्रह्मज्ञान की दीक्षा प्रक्रिया में सद्गुरु सर्वप्रथम इसी दिव्य नेत्र को जागृत करते हैं या दशम द्वार को खोलते हैं, ताकि हम अपने अद्भुत अलौकिक अंतर्जगत में प्रवेश कर सकें।

  जब अंतर्जगत का द्वार - 'तृतीय नेत्र' खुलता है, तो साक्षात ईश्वर और उसके लोक मंडलों का दर्शन होता है। वह भी तुरन्त... दीक्षा के समय ही। दीक्षा काल में एक शिष्य को यह साक्षात्कार कई रूपों में अनुभव होता है। उन्हीं में से एक रूप है - 'दिव्य प्रकाश।'

  दीक्षा काल के दौरान अंतर्जगत में दूसरी अनुभूति होती है - दिव्य नाद की। जैसे ही पूर्ण गुरुदेव तीसरा नेत्र या आज्ञा चक्र जागृत करते हैं, शिष्य के आंतरिक गगन में यह नाद प्रकट हो जाता है। इसे 'अनाहत' नाद कहते हैं। 'अनाहत' माने 'अन आहत' - जो बिना किसी वस्तु को आहत किए अपने आप निरंतर बजता है। इसका वर्णन संत दयाबाईजी करती हैं -

घंटा ताल मृदंग धुनि सिंह गरज पुनि होय।

दया सुनते गुरु कृपा तें बिरला साधू कोय।।

गगन मध्य मुरली बजै मैं जु सुनी निज कान।

'दया' दया गुरुदेव की परस्यो पद निर्बाध।।

   उक्त दोहे में जिन ध्वनियों का वर्णन दयाबाईजी ने किया है, वही अनहद नाद के रूप में ब्रह्मज्ञानी साधक को अंतर्जगत में सुनाई देती है।

     इनके अतिरिक्त अन्य भी कई दिव्यानुभूतियाँ हैं, जिनका उद्घाटन पूर्ण गुरु ब्रह्मज्ञान की दीक्षा देकर शिष्य के भीतर तत्क्षण ही करते हैं। गुरु की पूर्णता और गुरुता इसी में है कि वे अपने शिष्य को प्रयोगात्मक रूप से (Practically) ईश्वर का साक्षात दर्शन और अनुभव कराएँ। इसलिए जहाँ प्रपंची गुरु आपसे कहते हैं - 'पहले अभ्यास करो; फिर अनुभूति होगी।' वहीं गुरुदेव श्री आशुतोष महाराज जी शास्त्रसम्मत तथ्य कहते हैं - 'पहले अनुभूति (साक्षात्कार /दर्शन), फिर अभ्यास। क्योंकि भीतर लक्ष्य के प्रकट होने पर ही उस पर ध्यान लगता है।'

**ओम् श्री आशुतोषाय नम :**

"श्री रमेश जी"

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