स्व शुभकरण जी को कोटि कोटि नमन!
- तराई के विकास में थी अहम भूमिका-
वरिष्ठ समाजसेवी व किसान नेता के पुण्यतिथि पर नमन !
बड़हलगंज। ये नाम भले ही प्रभु के चरणों लीन हो गया हो लेकिन पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की सोच को आगे बढ़ाने के लिए उनके प्रयासों से तराई को आबाद करने वाले शुभकरन तराईवासियों के दिलों में हमेशा जीवित रहेंगे। तराई के लोग उन्हें बहुआ जी के नाम से याद करते हैं।
देश आजादी के हरित क्रांति का दौर आया। जय जवान जय किसान कर नारा बुलंद करने वाले लाल बहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री बने। बलिया जिले के रेलवे विभाग में स्टेशन मास्टर बनबारी मिश्र के पुत्र शुभकरन मिश्र उर्फ बबूआजी विदेश में उच्च शिक्षा के लिए लंदन जाना चाहते थे लेकिन उनके ससुर स्वर्गीय बद्री नारायण मिश्र पूर्व विधायक सलेमपुर उप्र और पंजाब नेशनल बैंक के संस्थापक स्व. पुरुषोत्तम दास टंडन ने उनकी मुलाकात लाल बहादुर शास्त्री से कराई। शास्त्री जी ने कहा नौकरी नहीं किसान बनो।
शास्त्री भारत को कृषि प्रधान देश बनाना चाहते थे। क्षण भर की मुलाकत में बबुआ जी ने उनकी सोच को आत्मसात कर लिया और लंदन जाने का इरादा बदलकर खेती करने की तरफ रुख मोड़ लिया। उनकी प्रेरणा से बबुआ जी ने किसान बनकर खेती करने के लिए तराई में जमीन आवंटित कराई। उस दैरान तराई क्षेत्र घने जंगल, नदियों और बंजर भूमि पर खड़ी झाडियां से घिरा था। लेकिन जमीन अलर्ट होने के बाद में बलिया जिले को छोड़कर परिवार के साथ तराई में बसे। यहां खेती कर शास्त्री के सपनों को उड़ान दी और फिर जैसे-जैसे केंद्र सरकार की तरफ से यहां लोगों को भूमि आवंटित की गई, वैसे-वैसे तराई क्षेत्र में बहु तरीके बताने लगे। उन्होंने पूर्वांचल के लोगों को हमेशा प्रेरित किया और प्रोत्साहन भी दिया। तराई का इलाका धान की फसल के लिए काफी मुफीद था। जिसकी वजह से इस क्षेत्र की धान का कटोरा नाम से जाना जाने लगा। बबुआ जी की स्थिति बढ़ती गई और तराई के विकास में योगदान देने के लिए चट्टान की तरह आगे आए। उन्होंने समाज सेवा के क्षेत्र में भी खास योगदान दिया। गरीबों के मसीहा कहलाने लगे। कई समाज सेवी संगठनों की नींव रखी। इनमें खादी ग्रामोद्योग, तराई सेवा समिति, गुड खाडसारी, माचिस फैक्ट्री आदि की स्थापना की। पशुओं से उन्हें अथाह प्रेम था। पशुओं के इलाज की चुनौति को देख अस्पताल खुलवाया तकि गांव ही नहीं अपितु इलाके में पशुओं की मौत बीमारी से न हो। वे नौ वर्ष तक गन्ना सोसायटी के डायरेक्टर रहे।
शिक्षा के लिए जगाया अलख, खोला विद्यालय : शुभकरन मिश्रा एक किसान ही नहीं, वरन एक आदर्श समाजसेवी भी थे। उन्होंने बालिकाओं को शिक्षा से जोड़ने के लिए व उन्हें निःशुल्क शिक्षा दिलाने के लिए अपने गांव इंद्रपुर में ही सन 1970 में अपनी भूमि स्कूल के लिए दान में दी और बालिका विद्यालय बनवाया। इस स्कूल से तमाम बालिकाएं शिक्षित होकर बेहतर समाज का निर्माण करने में लगी है।
मैनेजर को 15 एकड़ और कर्मचारियों को दी 5-5 एकड़ भूमि दान : शुभकरन मिश्रा ने फार्म और घर पर काम करने वाले कर्मचारियों को करोड़ों रुपयों की बेसकिमती भूमि दान में दी थी। वह हमेशा कर्मचारियों के परिवार को अपने परिवार का सदस्य मानते थे। बबुआ जी के द्वारा रुद्रपुर के पास इंद्रपुर और सितारगंज के पास अपने कर्मचारियों को कृषि भूमि दान में दी थी। आज यह परिवार करोड़ों के मालिक है और समाज में उनका अच्छा रुतबा भी है। इन परिवारों के लिए बबुआ जी किसी फरिश्ते से कम नहीं थे।
पूर्वी यूपी में जन्में और देवभूमि में ली अंतिम सांस : बबुआ जी पूर्वी उत्तर प्रदेश के ग्राम परिखरा जिला बलिया में वर्ष 1930 में एक सामान्य परिवार में जन्में थे। परिवार ने शिक्षा को अपना माध्यम बनाया और आज देश-विदेश में उनके परिवार के लोग सेवा दे रहे हैं। उन्होंने भी वैरिस्टर बनने के लिए लंदन जाने की ठानी थी. लेकिन देश में हरित क्रांति का दौर आया तो वे लंदन न जाकर किसान बन गए। वर्ष 1955 से तराई में रहकर क्षेत्र को कृषि प्रदान बनाने में सहयोग किया और इंद्रपुर गांव के ही होकर रह गए और देवभूमि में ही 95 वर्ष की आयु में अंतिम सांस ली। वे पूर्व मुख्यमंत्री स्व. पंडित नारायण दत्त तिवारी भी बेहद नजदीकी रही।
लाल बहादुर शास्त्री से थे अच्छे संबंध : पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री से मुलाकात के बाद हरित क्रांति अपना योगदान करने वाले शुभकरन मिश्रा के शास्त्री से निष्ठ संबंध हो गए। शास्त्री भी उन्हें अपनी हरितक्रांति की मुहिम का सदस्य मानते। शास्त्री के राष्ट्रीय कृषि उत्पाद बोर्ड और भारतीय निगम की स्थापना की ही प्रेरणा लेकर तराई में कई संगठन बनाए थे।
बबुआ जी के परिवार के सदस्य रहें हैं न्यायाधीश, लोकायुक्त और आयुक्त : बबुआ जी के परिवार के लोगों ने देश में बनाई है अपनी खास पहचान। उनके पारिवारिक वर्ग संबंधी न्यायाधीश, आयकर जिलाधिकारी लोकायुक्त व विधायक के पद पर रहे है। बबुआ जी का परिवार तराई में बहुत लोकप्रिय है।
