सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।
यदि किसी पार्टी में, शोर के बीचो बीच आपका नाम पुकारा जाता है, तो क्या अपना नाम सुन पाएंगे? शोध बताते हैं कि अधिकतर व्यक्ति अपने नाम को सुन पाते हैं। यह इसलिए हो पाता है क्योंकि मानव मन और बुद्धि का स्वभाव है कि वह बाकी सब शोर को अलग कर, अपने पहचान और रुझान वाले शब्दों को सुन लेती है।
इसी प्रभाव को अध्यात्म के मार्ग पर अपनाने से बहुत लाभ मिल सकता है। आपने देखा कि शोर के बीच भी हम अपना नाम इसलिए सुन पाते हैं, क्योंकि हमारा अपने नाम के साथ बेहद गहरा सम्बन्ध होता है। जब हमें पूर्ण गुरु से ज्ञान दीक्षा मिलती है, तो वे हमारे भीतर ईश्वर का शाश्वत नाम प्रकट कर देते हैं। शुरु शुरु में, जब हम आँखें बंद कर ध्यान में बैठते हैं, तब हमें केवल विचारों का शोर ही सुनाई देता है। इसलिए ज्यादा देर तक ध्यान नहीं कर पाते। परंतु यदि हम नियमित ध्यान साधना करेंगे, श्वासों में चल रहे आदिनाम पर एकाग्र होने का ईमानदार अभ्यास करेंगे, तो हमारी उस ईश्वर के नाम के साथ पहचान बढ़ेगी। हमारा उसके प्रति रुझान बढ़ेगा। और देखते ही देखते हमारा प्रभु के नाम से इतना गहरा संबंध बन जाएगा कि विचारों के तूफानी शोर के बीच में भी हमें वह सुनाई देगा।
इसलिए ज्ञान दीक्षा लेकर नियमित साधना करें। सुमिरन करने का भी ईमानदार प्रयास करें। क्योंकि ईश्वर के नाम पर एकाग्र होने से ही जीवन में शांति व आनंद की प्राप्ति हो सकती है।
**ओम् श्री आशुतोषाय नम :**
"श्री रमेश जी"
