सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।
एक व्यक्ति था, जाॅन। उसके जीवन में बाकी सबकुछ बहुत बढ़िया था, बस अपच की बीमारी ने उसका जीना दूभर किया हुआ था। बदहजमी की पीड़ा में, आखिरी सांस लेते हुए, जाॅन की गहराई से एक पुकार निकली - 'हे ईश्वर, जब तू मुझे अगला जीवन देगा, तो स्वस्थ शरीर देना।' उसी वक्त एक फरिश्ते ने आकर उससे कहा- 'तुम्हारी अर्जी स्वीकार कर ली गयी है।'
अगले जन्म में जाॅन को एकदम हृष्ट पुष्ट शरीर मिला। लेकिन वह बेहद गरीब परिवार में पैदा हुआ। दो जून की रोटी कमाने के लिए जाॅन ने बहुत हाथ पैर मारे। लेकिन उसकी किस्मत का सिक्का खोटा निकला। मरने से पहले उसने एक बार पुनः ईश्वर के आगे माँग रखी - 'देखो भगवान, अगली बार यहाँ भेजेगा, तो स्वस्थ शरीर के साथ थोड़ी धन वाली किस्मत भी दे देना।
पुकार एक बार फिर स्वीकार कर ली गयी। इस बार जाॅन के पास सेहत भी थी और पैसा भी। पर वह बिल्कुल अकेला था। जीवन साथी ढूंढने का काफी प्रयास किया। लेकिन कोई संयोग ही नहीं बना। इस बार मरते समय जाॅन बोला - 'भगवान, अगले जन्म में अच्छी सेहत और प्रचुर धन के साथ, एक जीवनसाथी भी दे देना।'
अगले जन्म में जाॅन को अपनी माँग के अनुसार सबकुछ मिला - ताकतवर शरीर, धन शौहरत और पत्नी भी। पर अफसोस, पत्नी बेहद झगड़ालू निकली। जाॅन ने इस बार फिर से अपनी माँग की सूची में संशोधन किया। ईश्वर से स्वस्थ शरीर, धन और अच्छी पत्नी देने के लिए कहा।
अब जब अच्छी पत्नी भी मिल गई, तो बच्चों की कमी खलने लगी। सो, अगले जन्म में संतान की मांग करके उसने यह कमी भी पूरी कर ली। पर यह क्या? इस बार बच्चे स्वार्थी निकले। बुढ़ापे में उससे सम्पत्ति के लिए झगड़ने लगे। जाॅन अंदर तक टूट गया और ईश्वर के आगे जोर जोर से रोने लगा। इस बार भगवान की आवाज आई- 'कहो जाॅन, अब और क्या माँगना चाहते हो?' जाॅन ने हाथ जोड़कर कहा - 'और कुछ नहीं प्रभु... केवल आप। चाहे आप मुझे अच्छी सेहत दें या न दें, धन रुतबा दें या न दें, अच्छी पत्नी और बच्चे दें या न दें... लेकिन आप मुझे मिल जाएँ। मैने जान लिया प्रभु कि आप नहीं थे, तो सबके होने पर भी मैं सुख नहीं पा सका। परंतु जिसके संग आप, ईश्वर होंगे, उसे फिर कोई गम छू भी नहीं सकेगा।'
सचमुच में भगवत प्रेमियों, हमेशा स्मरण रखना - 'जिसके पास ईश्वर है, उसके पास संसार का चाहे कोई सुख ऐश्वर्य न हो... वह फिर भी तृप्त और आनंद में मग्न रहता है। परंतु जिसके पास ईश्वर नहीं, उसे फिर सारा संसार ही क्यों न मिल जाए... वह तब भी दरिद्र और दु:खी ही रहता है।
**ओम् श्री आशुतोषाय नम :**
"श्री रमेश जी"
