सर्व श्री आशुतोष महाराज जी की कृपा वर्षा.
सोलह सिंगार में सिंदूर भी विशेष स्थान रखता है। भारतीय महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र के लिए सिंदूर लगाती है। ऐसी मान्यता है कि इसे लगाने से विवाहिता को मां पार्वती द्वारा 'अखंड सौभाग्यवती'होने का आशीर्वाद प्राप्त होता है। इसके न केवल धार्मिक बल्कि वैज्ञानिक लाभ भी है।
इन दिनों महिलाएं सिंदूर का छोटा सा बिंदी माथे के सिर पर लगा लेती हैं। पर सिंदूर को हमेशा सिर के मध्य भाग में लगाना चाहिए। इस स्थान पर मस्तिक की एक अति संवेदनशील 'ब्रह्मरंध्र' ग्रंथि स्थित होती है। यह ग्रंथि सिर के बीच की मांग से लेकर मस्तक के अंत तक होती है। मांग में सिंदूर भरने से यह ग्रंथि स्पंदित हो जाती है। प्राकृतिक सिंदूर-हल्दी, चूना और परा (मरकरी) के संयोग से बनता है। पारे की धातु में कई औषधिय गुण विशेषत: शीतलता होती है। इसलिए सिंदूर लगाने से दिमाग तनाव रहित और ठंडा रहता है। इससे रक्तचाप नियंत्रित रहता है और यह चेहरे पर झुरिया आने से रोकता है। एक्यूप्रेशर में सिंदूर का प्रयोग औषधि की तरह किया जाता है। इससे जीवी 22 से जीवी 29 एक्यूप्रेशर बिंदु तक दबाव बना रहता है, जिससे रक्त संचार सामान्य और दिमाग शांत रहता है।
आजकल बाजार में केमिकलयुक्त सिंदूर आने लगा है। इसमें लेड ऑक्साइड, सल्फेट और सिंथेटिक डाई होती है। लेड ऑक्साइड त्वचा में जलन पैदा करता है। सिंदूर में सल्फेट की मौजूदगी कैंसर जैसे भयावह रोग को आमंत्रण देती है। सिंथेटिक डाई से बाल झड़ने लगते हैं। गर्भावस्था में रसायन युक्त सिंदूर लगाने से शिशु को भी हानि हो सकती है। जहां ऑर्गेनिक सिंदूर नारंगी रंग का होता है, वही आजकल अधिकतर लाल रंग का सिंदूर देखने को मिलता है। इसलिए हमेशा नेचुरल तरीके से बने प्राकृतिक सिंदूर का उपयोग करना चाहिए। ताकि एक विवाहिता को सिंदूर का धार्मिक और आध्यात्मिक दोनों लाभ मिलता रहे।
ॐ श्रीं आशुतोषाय नमः
श्री सियाबिहारी जी ✍️
