**हम दूसरों को उनके बाहरी कर्म से आँकते हैं, पर खुद का आकलन अपनी आंतरिक सोच के आधार पर करते हैं।**

सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।


हम दूसरे लोगों का बहुत जल्दी आकलन कर, उनके खिलाफ फैसला दे देते हैं। हम सिर्फ इस बात पर ध्यान देते हैं कि उन्होंने किसी परिस्थिति में जो किया, वह व्यावहारिक या सामाजिक दृष्टि से गलत है या सही। हम कभी भी इस बारीकी में जाने की कोशिश नहीं करते कि उनका वैसा कार्य या व्यवहार करने के पीछे कारण क्या रहा होगा? किन्तु वहीं यदि वही काम हम कभी किसी परिस्थिति में करते हैं, तो? तो हमारा उस कार्य को करना गलती नहीं, बल्कि मजबूरी होती है। हम स्वयं पर नहीं, बल्कि परिस्थितियों पर दोषारोपण करने लगते हैं। हम दूसरों को उनके बाहरी कर्म से आँकते हैं, पर खुद का आकलन अपनी आंतरिक सोच के आधार पर करते हैं।

   किन्तु सफल व्यक्ति कभी भी इस प्रभाव का अनुसरण नहीं करते। बल्कि वे इससे बिल्कुल विपरीत व्यवहार करते हुए जीवन की ऊँचाइयों को छूते हैं। दूसरों के प्रति सहिष्णु रहें और स्वयं के साथ सख्ती से पेश आएँ। माने कि हमेशा दूसरों को संदेह का लाभ (Benefit of Doubt) देना चाहिए। उनकी गलतियों के प्रति उदार भाव रखना चाहिए। हर छोटी बात पर उन्हें कटघरे में खड़ा करने की आवश्यकता नहीं है। यदि उनकी गलती किसी को कोई नुकसान नहीं पहुँचाने वाली, तो उसे तूल न दें। हल्के में जाने दें।

   पर स्वयं की हर छोटी से छोटी गलती पर पैनी दृष्टि रखें। अपनी किसी भी त्रुटि को मजबूरी का नाम न दें। भूल से हुई भूल को भी सुधारने और दोबारा न दोहराने का संकल्प लें। तभी आप अपने जीवन में उच्चता को प्राप्त कर पाएँगे।

**ओम् श्री आशुतोषाय नम :**

"श्री रमेश जी"




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