सर छुपाने को मैं कहां जाऊं, मैं मुअज्जिम न मैं पुजारी हूं ! मुझको घर से निकाल मत बेटे , तेरे बचपन की मैं सवारी हूं !

 

               कार्यक्रम में पधारे साहित्यकार जन

भागीरथी सांस्कृतिक मंच,गोरखपुर की 808 वी काव्य गोष्ठी विस्तार नगर कालोनी,बरगदवा निवासी युवा कवि प्रशांत श्रीवास्तव के आवास पर संपन्न हुई।

काव्य गोष्ठी की अध्यक्षता वरिष्ठ गीतकार वीरेंद्र मिश्र "बिरही' जी ने कीऔर कार्यक्रम के मुख्य अतिथि वरिष्ठ कवि श्री प्रमोद कुमार जी रहे।

कार्यक्रम का विधिवत संचालन संस्था सचिव कुन्दन वर्मा "पूरब" ने किया।

कार्यक्रम का विधिवत शुभारंभ वरिष्ठ कवि राम सुधार सिंह सैथवार जी द्वारा प्रस्तुत वाणी वंदना से हुआ।

तत्पश्चात बस्ती से पधारे वरिष्ठ शायर दीदार बस्तवी ने अपने ग़ज़ल के इस शेर से सोचने पर विवश किया-

सर छुपाने को मैं कहां जाऊं,

मैं मुअज्जिम न मैं पुजारी हूं !

मुझको घर से निकाल मत बेटे ,

तेरे बचपन की मैं सवारी हूं !

आज के तत्कालीन हालात पर नजर डाली वरिष्ठ ग़ज़लकार निरंकार शुक्ल "साकार" ने -

भाईचारे की कीमत खत्म हो गई,

एकता की जरूरत खत्म हो गई !

कुछ इधर हो गए कुछ उधर हो गए,

मध्य वालों की ताकत खत्म हो गई!

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि वरिष्ठ कवि प्रमोद कुमार जी ने धर्म के डर पर यह बेबाक रचना प्रस्तुत की -

धर्म का डर/धर्म पर /सवार था/ डर के अनुसार/सब की औकात थी ?

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ गीतकार वीरेंद्र मिश्र "बिरही" जी ने कवियों को साधुवाद दिया और सनातन धर्म की सहिष्णुता पर गीत प्रस्तुत किया उसकी चंद पंक्तियां इस तरह है - 

जाने कितने आये और गये यहां,

चाहा था हमें मिटाना भी !

हम क्षमाशील इतने उदार , 

उनको ही दिये ठिकाना भी!!

अन्य जिन कवियों ने काव्य पाठ किया उनके नाम है, सर्वश्री आचार्य ओम प्रकाश पांडेय,सम्बुल हाशमी, अवधेश शर्मा 'नंद' , अरविंद 'अकेला' , विनय 'मितवा' , राम सुधार सिंह सैथवार, डा. सत्य नारायण 'पथिक' , कुन्दन वर्मा 'पूरब' , प्रशांत श्रीवास्तव, सुधाकर साहनी , रत्नेश 'सृजन' और महेंद्र नाथ श्रीवास्तव आदि।

श्रोताओं में कवि प्रशांत श्रीवास्तव के परिवारीजन एवं मनोज शुक्ला 'मंतोष' उपस्थित रहे।

अंत में सभी के प्रति आभार व्यक्त किया युवा कवि प्रशांत श्रीवास्तव जी ने।

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