सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।
चकोर का चंदा से प्रेम अतुलनीय माना गया है। साहित्य जगत में तो आजतक हमने यही पढ़ा है।
पर गोस्वामी तुलसीदास जी ने एक चौपाई में लिख दिया -
"रामहि लखनु बिलोकत कैसें।
ससहि चकोर किसोरकु जैसें।।"
माने, लक्ष्मण श्री राम को यूँ आनंदित होकर निहार रहे थे, जैसे चन्द्रमा को चकोर का बच्चा निहारता है।
बस, गोस्वामी जी की यह पंक्ति तो कवियों के गले में जा अटकी। यदि उन्हें श्री राम के प्रति लखन जी के एकनिष्ठ प्रेम की बात करनी ही थी, तो उन्हें लिखना चाहिए था कि लक्ष्मण श्री राम जी को यूँ निहार रहे थे, जैसे चकोर चंदा को निहारता है। उन्होंने चकोर का बच्चा क्यों लिख दिया? इसी कारण गोस्वामी जी को साहित्यकारों ने कटघरे में खड़ा कर दिया। तब गोस्वामी जी ने अपना पक्ष रखते हुए कहा-
गोस्वामी जी- भाई, लक्ष्मण जी का प्रेम है असीम और चकोर का प्रेम ठहरा ससीम। भला मैं दोनों को कैसे समान माप देता?
साहित्यकार (फटी आँखों से) - क्या?? चकोर का प्रेम ससीम?
गोस्वामी जी- जी, बिल्कुल। और साथ ही एकनिष्ठ भी नहीं है।
साहित्यकार (आपा खोते हुए) - आप जानते भी हैं, आप कह क्या रहे हैं? चकोर का कोई सानी नहीं। वह चाँद के प्रेम में पूरी रात पलक नहीं झपकाता है। और आप कह रहे हैं, उसका प्रेम एकनिष्ठ नहीं है।
गोस्वामी जी - बंधु, इतना बिगड़ते क्यों हो? आपके प्रश्न में ही तो आपके उत्तर छिपे हैं। आपने कहा- पूरी रात... पर रात से पहले यानि दिन में?? दिन में तो चंद्रमा दिखाई ही नहीं पड़ता। वही चकोर, जो रात को चंद्रमा के प्रेम में पागल रहता है, दिन में किसी और का संगी बन जाता है ऐसे में तुम ही बताओ, वह एकनिष्ठ प्रेमी कैसे हुआ? उसके जीवन में तो चंदा के अलावा चकोरी का भी स्थान है।
पर वहीं हमारे लखन जी का प्रेम देखिए। न बंटता है, न घटता है और न ही दिन और रात के साथ बदलता है। इसलिए मैने उनके प्रेम को रखने के लिए चकोर का नहीं, बल्कि चकोर के बच्चे का उदाहरण लिया। जानते हो, चकोर का बच्चा रात को तो चंदा के प्रेम में डूबा ही रहता है। दिन में किसी डाल पर अकेला, गुमसुम सा बैठा रहता है। रात होने का बैसब्री से इंतजार करता है। श्री लक्ष्मण जी के जीवन के तो केवल श्री राम ही प्राणाधार हैं। चाहे फिर वह कोई भी प्रहर क्यों न हो।
ठीक ऐसे ही साधको, हमारा गुरुदेव के प्रति प्रेम होना चाहिए। चकोर जैसा नहीं, बल्कि चकोर के बच्चे जैसा। हमें श्री लक्ष्मण जैसा एकनिष्ठ भक्त बनना है। ऐसे हम बन सकें, ऐसी प्रार्थना भी गुरु महाराज जी से ही करनी है।
*ओम् श्री आशुतोषाय नम :**
"श्री रमेश ज
