**गुरु शिष्य के निर्माण के लिए उसे बाहर से विषम परिस्थितियों से गुजारते हैं, पर भीतर से उसका संबल बने खड़े रहते हैं।**

सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।

भक्तिकाल के सद्गुरु कबीर उत्तम कोटि के कवि भी थे। उन्होंने अपनी हर साखी, सबद, दोहे और वाणी से शिष्य समाज को चेताया, जगाया व प्रेरणा दी। उनकी एक विशेषता रही कि वे सामान्य जीवन की घटनाओं को देखकर, उनके ही आधार पर उन्होंने अध्यात्म के सूत्र रच दिए। इसी की एक झलक लेते हैं.... ।

"गुरु धोबी सिख कापड़ा, साबू सिरजन हार।

सुरती सिला पर धोइए, निकसे ज्योति अपार।।"

  अर्थ- यदि शिष्य कपड़ा है, वह भी मैला; तो गुरु धोबी के समान हैं। जैसे धोबी शिला पर पटक पटक कर कपड़े की मैल निकालता है और उसका रंग निखार देता है। वैसे ही सुरत की कला सिखाकर यानि प्रभु से जुड़ने की सुमिरन कला देकर गुरु भी शिष्य के विकारों की मैल को काट देते हैं और उसके भीतर आत्मा का प्रकाश जग- 

मगाने लगता है।

"सब धरती कागद करूँ, लेखनी सब बनराय।

सात समुद्र की मसि करूँ, गुरु गुण लिखा न जाए।।"

  अर्थ- यदि सारी धरती को कागज बना लें, जंगलों के सभी वृक्षों की लकड़ी से कलम, सात समुद्रों के जल को स्याही - तब भी गुरु महिमा लिखी नहीं जा सकती। वह अनंत है।

"गुरुमुख गुरु चितवत रहे, जैसे मणिही भुजंग।

कहैं कबीर बिसरे नहीं, यह गुरुमुख को अंग।। "

  अर्थ - जैसे सर्प मणि को निहारता रहता है, वैसे ही शिष्य को भी गुरु के आदर्शों की ओर देखते रहना चाहिए। उसे कभी गुरुदेव के सिद्धांतों को भूलना नहीं चाहिए, यही गुरुमुख का लक्षण है।

"गुरु कुम्हार शिष कुंभ है, गढ़ि-गढ़ि काढ़ै खोट।

अन्तर हाथ सहार दै, बाहर बाहै चोट।।"

  अर्थ - यदि गुरु को कुम्हार की संज्ञा दें, तो शिष्य कुंभ (घड़ा) के समान है। जैसे कुम्हार कुंभ बनाते हुए उसे बाहर से चोट देता है पर भीतर से हाथ का सहारा देता है। वैसे ही, गुरु भी शिष्य के निर्माण के लिए उसे बाहर से विषम परिस्थितियों से गुजारते हैं, पर भीतर से उसका संबल बने खड़े रहते हैं।

**ओम् श्री आशुतोषाय नम :**

"श्री रमेश जी"

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