सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।
गुरुदेव श्री आशुतोष महाराज जी अक्सर बताते हैं - 'अध्यात्म के दो पक्ष होते हैं - सैद्धांतिक ज्ञान और प्रयोगात्मक विज्ञान।' जैसे कि नाम से ही स्पष्ट है, सैद्धांतिक पक्ष माने बड़े-बड़े सिद्धांतों, मत मतांतरों का ज्ञान। यह अध्यात्म का वो पहलू है, जिसमें ज्ञान केवल शब्दों के आवरण तक सीमित है। जहाँ ईश्वर केवल चर्चाओं व शास्त्रार्थों का विषय बनकर रह जाता है। आज के परिवेश में मुख्यतः यही पहलू उभर कर सामने आता है।
पर वहीं अध्यात्म का दूसरा पक्ष है - प्रयोगात्मक विज्ञान। इसके अंतर्गत अध्यात्म के सैद्धांतिक पक्ष को अनुभव का आधार दिया जाता है। ईश्वर का प्रत्यक्ष दर्शन या साक्षात्कार किया जाता है।
"वेदाहमेतं पुरुषं महान्तमादित्यवर्णं तमस: परस्तात्।" (यजु. 31/18)
-मैं उस परम पुरुष को जानता हूँ, जो सूर्य की भाँति प्रकाश रूप है।
अत: संक्षिप्त में कहें, तो अध्यात्म के सिद्धांतों का अंतर्जगत में अनुभव करना ही प्रयोगात्मक विज्ञान है।
भगवान श्रीकृष्ण गीता (9/1) में उद्घोष करते हैं -
'ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेशुभात्।।'
-मैं इस गोपनीय ज्ञान को विज्ञान सहित कहूँगा, जिसे जानने के पश्चात तुम समस्त बंधनों से मुक्त हो जाओगे।
यही आध्यात्मिक पथ पर पूर्ण सफलता का महासूत्र है। अगर हम मात्र सैद्धांतिक ज्ञान तक सिमटे रहेंगे, प्रयोगात्मक पक्ष की ओर कदम नहीं बढ़ाएंगे, तो हम भी परमात्मा रूपी परीक्षक की दृष्टि में उत्तीर्ण नहीं हो सकेंगे।
"दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान" इसी जागृति का शंखनाद आज समाज में कर रहा है। गुरुदेव "श्री आशुतोष महाराज जी" कई दशकों से गीता की "ज्ञानं विज्ञानसहितं" की उक्ति को जन जन में साकार कर रहे हैं।
**ओम् श्री आशुतोषाय नम :**
"श्री रमेश जी"
