**सिर के सारे बालों से ही हाथ न धो बैठें।**

 सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।

एक पौढ़ व्यक्ति की दो पत्नियां थीं। उनमें से एक हमउम्र थी और दूसरी उससे काफी छोटी थी। दोनो पत्नियां अपने पति को अपने-अपने मनपसंद रूप में देखना चाहती थीं। जब पति के बाल सफेद होने लगे, तो जवान पत्नी को यह अच्छा नहीं लगा। उसे लगा कि उसका पति उसके पिता जैसा लगेगा। इसलिए उसने अपने पति को कहा कि वह अपने सफेद बालों को तोड़कर निकाल दे।

  दूसरी ओर आदमी की बड़ी पत्नी ने जब अपने आप को बुढ़ाते देखा, तो वह भी परेशान रहने लगी। यह सोचकर कि कहीं लोग उसे उसके पति की माँ न समझ बैठें। इसलिए उसने अपने पति को कहा कि वह अपने काले बालों को तोड़ दे। इसका परिणाम यह हुआ कि एक दिन वह आदमी पूरा गंजा हो गया।

*संस्कृत सुभाषितानि*

"सतां हि सन्देहपदेषु वस्तुषु प्रमाणमन्तकरण प्रवृत्तय:।"

-- ऐसे कर्म करो जो उत्तम हों, शास्त्रों के अनुसार हों। परंतु संदेह व द्वन्द्व के अवसर पर अन्त:करण की वाणी प्रमाण होती है। हमेशा अपनी अंतरात्मा को ही प्रथम रखना चाहिए।

"यत्कर्म कुर्वतोस्य स्यात्परितोषोन्तरात्मन:।

यत्प्रयत्नेन कुर्वीत विपरीतं तु वर्जयेत्।।"

-- जिस कर्म को करने से अंतरात्मा को संतोष मिलता हो,  उसे प्रयत्न से करना चाहिए और विपरीत को त्याग देना चाहिए।

**शिक्षा **

हमें लोगों से हर परिस्थिति में अलग अलग राय मिलती है। परंतु अगर सबकी बातों का अनुसरण करने लगे, तो कभी भी निवारण तक नहीं पहुंच पाएँगे। लाभ की जगह अपनी हानि कर लेंगे। ऐसे में जब भी दो मतों में अंतर्द्वंद्व हो, तो अपनी अंतरात्मा के स्वरों की ताल पर निर्णय लें।

**ओम् श्री आशुतोषाय नम :**

"श्री रमेश जी"

Post a Comment

Previous Post Next Post