**गहरी साँसों की गहराई**

 सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।

    

साँसों से ही हमारा जीवन है। पर जीवन भर हम इन श्वासों की वास्तविक गहराई से अनभिज्ञ रहते हैं। अनुभवियों के अनुसार लगभग 99% लोग ठीक प्रकार से साँस लेना नहीं जानते। हम पूरे जोश से यह कह तो देते हैं - 'साँसों से ही हमारा जीवन है। पर जीवन भर हम इन श्वासों की वास्तविक गहराई से पूरी तरह अनभिज्ञ रहते हैं।

  मूलत: श्वास का तीन स्तरों पर वर्गीकरण किया जा सकता है- स्थूल श्वास, सूक्ष्म श्वास, तथा सूक्ष्मतम श्वास।

*स्थूल श्वास*

     ये वे साँसें होती हैं, जिन्हें हम हर दिन, हर पल, बेध्यानी में लिए चले जाते हैं। स्थूल दृष्टिकोण से, साँस मात्र अंत:श्वसन (inhalation) और नि:श्वसन (exhalation) की एक प्रक्रिया है। इस स्थूल श्वास की महत्ता को समझना भी आवश्यक है।

    सही प्रकार से साँस न लेने का सीधा-सीधा अर्थ है - छोटी व उखड़ी हुई साँसें लेना। छोटी साँस का मतलब कम आक्सीजन का अंदर जाना। कम आक्सीजन याने दूषित रक्त का पूरी तरह से स्वच्छ व निर्मल न बन पाना। ऐसा इसलिए कि आक्सीजन की मदद से ही अवांछित तत्वों को रक्त से कार्बन डाइआक्साइड के रूप में निष्कासित किया जाता है। अत: कम आक्सीजन लेने के कारण विषाक्त रक्त ही पुन: हमारी रक्त धमनियों में प्रवाहित होने लगता है। बीतते समय के साथ ये दूषित कण हमारी धमनियों में जमा होते चले जाते हैं। इस कारण से रक्त संचालन बाधित होता है।

*सूक्ष्म श्वास*

   श्वास का यह स्तर हमें प्राण जगत से परिचित कराता है। स्थूल स्तर से थोड़ा गहरा झाँकने पर हम पाते हैं कि हमारा शरीर नाड़ियों का एक सघन जाल है। ये नाड़ियाँ सूक्ष्म हैं। प्रत्येक नाड़ी नलिका की तरह होती है, जिसमें से प्राण शक्ति प्रवाहित होती है। स्थूल शरीर के संचालन में जो भूमिका श्वास की होती है; सूक्ष्म शरीर में वही भूमिका प्राण शक्ति निभाती है।

   यदि हमारे दिनभर के जीवन क्रम में प्राण शक्ति की मात्रा बढ़ जाए, तो नि:संदेह हम और अधिक स्फूर्त व सशक्त महसूस करते हैं। हम प्राणायाम की सहायता से श्वासों को तथा श्वासों के माध्यम से प्राण शक्ति की मात्रा को नियंत्रित कर सकते हैं। प्राणायाम का अर्थ ही होता है, प्राणों का आयाम। याने श्वासों की गति को नियंत्रित करना। लम्बी गहरी श्वासों से ज्यादा आक्सीजन हमारे भीतर आती है। इससे हमारे भीतर प्रचुर मात्रा में प्राण शक्ति का संचार होता है।

    लेकिन प्राणायाम का अभ्यास हमें श्वासों पर नियंत्रण सिखाकर सशक्त तो बनाता है। परंतु वही सबकुछ नहीं है। उससे ऊपर भी कुछ है, जो दिव्य है। प्रकाशमय है। जिससे हमारी वास्तविक पहचान बनती है। हमारे समस्त शास्त्र ग्रंथों के अनुसार- अपने दिव्य स्वरूप का साक्षात्कार, कर लेना ही हमारे जीवन का परम ध्येय है।

*सूक्ष्मतम श्वास*

    श्वास के इस चैतन्य स्तर को विभिन्न संज्ञाएं दी गई हैं - आदिनाम, दिव्य नाम, शाश्वत नाम, ईश्वर की श्वास इत्यादि। यह आदिनाम ही हमारे अस्तित्व का वास्तविक आधार है। जब हम अपनी साँसों में छिपी इस सूक्ष्मतम दिव्यता के संपर्क में आते हैं तो हम अपने भीतर अथाह शांति, सुकून व आनंद का अनुभव करते हैं।

   समस्त शास्त्र ग्रंथों के अनुसार यह आदिनाम की तरंग सुषुम्ना नाम की सूक्ष्म नाड़ी में प्रवाहित होती है। रीढ़ के मध्य में सुषुम्ना स्थित है। यह वह मार्ग है, जिस पर चलकर दिव्य अमृत को प्राप्त किया जाता है। इसलिए -

'सुषुम्नैव परं तीर्थम् सुषुम्नैव परोजप:।

सुषुम्नैव परं ध्यानं सुषुम्नैव परा गति:।।'

अर्थात सुषुम्ना से बढ़कर कोई तीर्थ नहीं है। न ही कोई जप या ध्यान इससे श्रेष्ठ है। केवल और केवल सुषुम्ना ही मुक्ति का मार्ग है।

   साधारण मनुष्यों में (जो अध्यात्म से नहीं जुड़ा है) यह सुषुम्ना प्रायः बंद ही होती है। एक जागृत संत (सद्गुरु) वह तरीका (ब्रह्मज्ञान की दीक्षा) प्रदान करते हैं, जिससे यह रास्ता खुल जाता है।... याने इसमें से ऊर्जा को प्रवाहित करवा दिया जाए, तो समझ लें, हमने समस्या को हल कर लिया।... तब संपूर्ण ज्ञान स्वत: ही हमें प्राप्त हो जाता है। जहाँ देह का कोई बंधन नहीं रहता।

   श्वास का यह सूक्ष्मतम स्तर जब सक्रिय होता है, तब यह हमारे 'कारण शरीर' में हलचल मचा देता है। कारण शरीर में सूक्ष्म रूप से हमारे पूर्व जन्मों के कर्म संस्कार जमा होते हैं। इन्हीं के वशीभूत होकर हम मानसिक दुष्प्रवृत्तियों के बहाव में बह जाते हैं। परंतु जब हम आदिनाम के संग जुड़ते हैं, तब इन संस्कारों की पकड़ ढीली पड़ने लगती है।

   यहां यह जान लेना भी आवश्यक है कि ऐसा कब हो पाता है? केवल तभी जब हम एक ब्रह्मनिष्ठ तत्ववेत्ता सद्गुरु की शरण में जाते हैं। वे हमें ब्रह्मज्ञान में दीक्षित कर, हमारी दिव्य दृष्टि जागृत कर देते हैं। फिर हमारे भीतर आदिनाम को प्रकट कर देते हैं।

  इसलिए हमें श्वास के इस सबसे गहन स्तर तक पहुंचने की आवश्यकता है। एक पूर्ण सद्गुरु के द्वारा उस ब्रह्मज्ञान को पाएं और इस अनुभव को प्राप्त करें।

"यही मनुष्य के जीवन की सर्वश्रेष्ठ उपलब्धि है।"

**ओम् श्री आशुतोषाय नम:**

"श्री रमेश जी"

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