कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ भोजपुरी गीतकार श्री सुभाष यादव जी ने किया व संचालन युवा कवयित्री श्रीमती बिंदू चौहान ने किया।
कार्यक्रम का विधिवत शुभारंभ हिमांशु मिश्र द्वारा प्रस्तुत मां सरस्वती की वंदना से हुआ।
तत्पश्चात युवा कवि सुधाकर साहनी ने इस शेर से सभी का ध्यान आकृष्ट किया -
जिसे अपना समझा वही बेगाना निकला,
नये कपड़े में जिस्म पुराना निकला।
युवा कवयित्री श्रीमती शशि पाण्डे बिट्टू ने मां की स्मृतियों को कुछ इस तरह सहेजा -
माई कागा के भेली देखावल करें, बबुआ आई सगुन उचरावल करें।
वरिष्ठ कवयित्री श्रीमती अंजू विश्वकर्मा ने मानव मन की चाह इन शब्दों में उकेरी -
खुश नहीं पर मन भरा उल्लास है, मंजिलों की चाह मन में आस है ।कौन देता है किसी का साथ अब, गर्त में देखा करें परिहास है ।।
अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ भोजपुरी गीतकार श्री सुभाष यादव जी ने अपनी प्रसिद्ध रचना माई लोगों की फरमाइश पर प्रस्तुत किया -
जग में माई बिना केहुवे सहाई ना होई ,
केहू केतनो दुलारी बाकिर माई ना होई।
अन्य जिन कवियों ने काव्य पाठ किए उनके नाम है श्रीमती बिंदू चौहान, श्रीमती वंदना सूर्यवंशी व श्रीमती ममता विश्वास एवं सर्व श्री वीरेंद्र मिश्र 'बिरही' डॉ. सुधीर श्रीवास्तव 'नीरज', डा .सत्य नारायण 'पथिक', राम समुझ 'सांवरा', हिमांशु मिश्र, राम सुधार सिंह सैथवार, अरविंद 'अकेला' , अवधेश शर्मा 'नंद' व राघवेंद्र मिश्र आदि।
श्रोताओं में बिरही जी के परिवारी जन उपस्थित रहे।
अंत में सभी के प्रति आभार व्यक्त किया श्री वीरेन्द्र मिश्र 'बिरही' जी ने।
