सर्व श्री आशुतोष महाराज जी की कृपा वर्षा.
एक बार गोस्वामी तुलसीदास जी से किसी सज्जन ने पूछा-'गोस्वामी जी, आप किसके उपासक हैं-निर्गुण या सगुण के?
गोस्वामी जी-दोनों के।
सज्जन-दोनों के! पर स्वामी जी, दो किश्तियों में सवार होकर आप कैसे तरेगे?
गोस्वामी जी-ये किश्तियां अलग-अलग है ही कहां? निर्गुण और सगुण-दोनों अभेद है-सगुनहि अगुनहि नहिं कुछ भेदा'। एक तरल सलिल है, तो दूसरा सघन बर्फ!
सज्जन-माना की एक निराकार है और दूसरा साकार। परंतु आप इन दोनों तत्वों की एक साथ उपासना कैसे कर पाते हैं?
गोस्वामी तुलसीदास जी सीधी सी बात है-
*हिय निर्गुण,नयन्हि सगुन,रसना नाम सुनाम।*
हृदय (त्रिकुटी प्रदेश) में निर्गुण ब्रह्म का ध्यान करता हूं, नेत्रों में सगुण प्रभु, अपने सद्गुरु की सुंदर झांकी बैठता हूं और रसना से प्रभु नाम का सुमिरन करता हूं।
सज्जन-परंतु हृदय, नेत्रों और रसना को यही दायित्व क्यों?
गोस्वामी जी- भले मानस, क्योंकि हृदय अनुभव करता है, इसलिए उसके लिए निर्गुण है। आंखों को सौंदर्य में रमने का आदत है, इसलिए उसके लिए सगुण है। तथा रसना को रसास्वादन का चस्का लगा है, इसलिए उसे मैं सुनाम का रस पिलाता हूं।
ॐ श्रीं आशुतोषाय नमः
श्री सियाबिहारी जी ✍️
