**अंतर्घट में ईश्वर के तत्व का दर्शन कर लेना ही अध्यात्म ज्ञान है।**

 सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।

संत कबीर दास जी कहते हैं -

'गुरु बिन ज्ञान न उपजै, गुरु बिन मिलै न मोष।

गुर बिन लिखै न सत्य को, गुरु बिन मिटै न दोष।।'

  परंतु इसके साथ ही यह जानना भी जरूरी है कि सद्गुरु ज्ञान दीक्षा में देते क्या हैं? क्या शास्त्र ग्रंथों का पठन-पाठन ज्ञान है? क्या माला मंत्र मिल जाने को दीक्षा कहते हैं? क्या ज्ञान दीक्षा का मतलब ऋद्धि सिद्धि प्राप्त कर लेना है? या फिर आँखें बंद करके, कल्पना के जगत में उड़ान भरना ज्ञान ध्यान होता है?

गीता में भगवान श्रीकृष्ण ज्ञान से जुड़ी इन सारी धारणाओं का खंडन करते हुए कहते हैं -

"अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्वज्ञानार्थदर्शनम्।

एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोन्यथा।।"

   अर्थात अंतर्घट में ईश्वर के तत्व का दर्शन कर लेना ही अध्यात्म ज्ञान है। इसके अतिरिक्त अन्य 'सबकुछ' अज्ञान है।

    अत: ज्ञान न तो ग्रंथों का शाब्दिक रटन-पाठन है, न ऋद्धि - सिद्धि है, न ही कल्पना की उड़ान है। पूर्ण सद्गुरु द्वारा मिलने वाला ब्रह्मज्ञान इन सबसे बहुत परे है और ऊँचा भी।

**ओम् श्री आशुतोषाय नम:*

"श्री रमेश जी"

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