सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।
हम सभी लोग भली-भाँति जानते हैं कि इस संसार में सुख नहीं है, फिर भी स्थायी सुख की तलाश इस अस्थाई जगत में ही मरते दम तक खोजने की भूल करते रहते हैं।
इंसान का स्वभाव रहता तो कारण शरीर मे है, लेकिन प्रकट सूक्ष्म व स्थूल शरीर द्वारा होता है। हमारे आपके 90% कर्म बने हुए स्वभाववश ही होते हैं और सत्संग के अभाव में अक्सर स्वभाव बिगड़ने ही लगता है।
मनुष्य योनि को छोड़कर प्रकृति के अन्य सभी जीव मनुष्य योनि मे ही आने के लिए प्रगति कर रहे हैं। जबकि वर्तमान मनुष्य योनि मे हम से अधिक पाप हो जाने से हम स्वयं ही नीचे की योनियों मे जाने की तैयारियां कर रहे होते हैं।
सभी मनुष्यों के सकाम कर्मों को प्रकृति लिखती है। जब इंसान सकाम कर्मों को छोड़ निष्काम भाव से कर्म करने लगता है, तब परमात्मा हमारे निष्काम कर्मों को लिखने लगते हैं। जबकि ज्ञान मार्ग पर चलने वाले मनुष्यों की परमात्मा अंगुली भी पकड़ लेते हैं, लेकिन भक्तिमार्ग पर चलने वाले भक्तों को परमात्मा अपनी गोद में ही उठा लेते हैं।
**ओम् श्री आशुतोषाय नम:**
"श्री रमेश जी"
