सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।
भौतिक प्रकृति यानी सतोगुण +रजोगुण +तमोगुण सत्य होने के बावजूद भी इनसे प्रकट अन्य तत्व अनित्य हैं, जो एक निश्चित समय के बाद से समाप्त होते हैं। इसी तरह स्थूल शरीर के मरते ही सभी भौतिक उप्लब्धिआं समाप्त हो जाती हैं। लेकिन सूक्ष्म शरीर में संग्रहित पाप-पुण्य का लेखा-जोखा, जो भविष्य में कर्म फल व नए कर्म करने की प्रेरणा देते हैं, ही साथ जाते हैं।
दुनिया मे बने सभी रिश्ते स्वार्थ पर आधारित होते हैं। अतः मनुष्य स्वार्थ की पूर्ति के लिए अनुकूल और स्वार्थ समाप्त हो जाने पर बने हुए रिश्तों में प्रतिकूलता ले आता है। जबकि केवल गुरु और भगवान का ही सभी जीवों के प्रति रिश्ता प्रेम पर आधारित होता है। इसलिए सभी अनुकूल प्रतिकूल परिस्थितियों मे भी रिश्ता सदा बना रहता है।
परमात्मा को तत्व रूप से जान लेने पर परमात्मा से प्रेम किए बिना रहना असंभव है। यदि हमें परमात्मा की याद ही नहीं आती, तो हमें समझ लेना चाहिए कि अभी तक हमने परमात्मा को सही सही जाना ही नहीं। परमात्मा को जानने का आरंभिक सरल उपाय ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर केवल निरंतर सत्संग करते रहना ही है, जिसे अक्सर मनुष्य गम्भीरता से नहीं लेता है।
**ओम् श्री आशुतोषाय नम:**
"श्री रमेश जी"
