सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।
सभी जीवों की आत्माएं स्वभाव से तो ज्ञानवान हैं, लेकिन सभी आत्माएं अनादि काल से मायाबद्ध होने के कारण हमारा ज्ञान कम-अधिक मात्रा में ढका हुआ है। अर्थात प्रभु ज्ञान के बिना हम सभी अंधे और लंगड़े हैं। ज्ञान का दीपक जलने से ही हमें रास्ता दिखाई देने लगता है और परमात्मा रूपी मंजिल का बोध होता है। क्योंकि मनुष्य योनि केवल और केवल परमात्मा रूपी मंजिल को पाने के लिए ही मिली है।
सूर्य का उदय होना या सूर्य का अस्त होना संसारी भाषा मे ही कहा जाता है। जबकि सूर्य की दुनिया मे अंधकार यानी रात होती ही नहीं है। ऐसे ही परमात्मा की आध्यात्मिक दुनिया मे ज्ञानमयी प्रकाश और आनंद सदा ही बना रहता है। जबकि भौतिक जगत में पग पग पर हमें दुखों का सामना करना पड़ता है।
हम सभी मनुष्यों के सभी रिश्ते नाते जन्म लेने के साथ ही तन के स्तर पर बनते हैं और तन के मरने के साथ ही समाप्त भी हो जाते हैं। जबकि मन के रिश्ते मरने के बाद भी बने रहने की सम्भावना रहती है। दूसरी ओर आत्मा का सम्बन्ध परमात्मा से है, इसलिए टूटने का तो प्रश्न ही नहीं है।
**ओम् श्री आशुतोषाय नम:**
"श्री रमेश जी"
