*ईर्ष्या जलाए तो क्या करें?*

      सर्व श्री आशुतोष महाराज जी की कृपा वर्षा.


*यथा भूमिर्मृतमनाम।मृतान्मृतमनस्तरा।*

*यथोत मम्रुषो मन एवेष्र्योर्मृतं।* *

(अथर्ववेद(6/18/2)

अर्थर्वेद में ऋषि कहते हैं जैसे भूमि मृत -माना जाता है (स्थूल निष्प्राण) है, शव मृत माना है; ठीक है वैसे ही ईर्ष्यालु व्यक्ति भी मृत मना होता है।

इस 'मृत -मना'शब्द को जरा गहराई से समझते हैं। मृत-माना अर्थात जिसका मन मरा हुआ है। जो भूमि के समान जड़ है। जो चेतना शून्य है। विवेक रहित है। ठीक जैसे मृतक का मन नहीं होता। उसके भीतर अच्छे बुरे का कोई ज्ञान नहीं होता। इस प्रकार हमारे ऋषियों ने ईर्ष्यालु व्यक्ति को भी जड़ भूमि व मृत व्यक्ति की उपमा दी है। क्योंकि ईर्ष्यालु कि मनोभूमि भी जाडवंत होती है। चेतना होते हुए वह चेतना रहित होता है। उचित अनुचित के ज्ञान से विहिन होता है। संक्षिप्त में कहे तो द्वेषी व्यक्ति का मन भी मरा हुआ होता है।

जर्मन भाषा में से कहा गया है-schadenfreude.... इसका अर्थ होता है- Harm-joy, दूसरों को नुकसान या दुख से मिलने वाली खुशी। 

पर वेद कहते हैं  ईर्ष्यालु  की इस ' खुशी' या 'सुख'के साथ हमेशा 'दुख' जुड़ा रहता है। जो दूसरों की खुशी नहीं देख सकता, वह स्वयं भी हमेशा परेशान रहता है। देखिए अथर्ववेद (2/12/6) मैं  यहअंकित श्लोक 

*ब्रह्म वा यो निन्दिषत्क्रियमाणम्।*

*तपूंषि तस्मै वृजिनानि संतु ब्रह्मद्विषं धौरभिसंतपाति।।*

इस श्लोक के एक भाग का अर्थ है-हे मनुष्यो अगर तुम दूसरों द्वारा किए गए कर्म को सदा निंदा/ईर्ष्या की दृष्टि से देखते हो, तो पाप ही करते रहते हो। ऐसा 'ब्रह्मद्वेषी'मनुष्य सदा संतप्त व दुखी रहता है। प्राकृतिक का नियम है। 

ध्यान दीजिए, वेद में ईर्ष्यालु व्यक्ति की ब्रह्मद्वेषी कहकर अहवेलना की गई है। क्योंकि हम सभी के भीतर आत्मा है, वह ब्रह्म है जो हमारे प्रत्येक शुभ कर्म का कारण है। इसीलिए किसी से भेदभाव करना ,उसके कर्म से, उसकी सफलता से, द्वेष करना उसके भीतर बैठे ब्रह्म से द्वेष करना है। आगे वेद  कहता है कि ऐसा 'ब्रह्मद्वेषी'हमेशा खिन्न और उदास रहता है। 

अत: इस ईर्ष्या बचने के लिए सद्गुरु के शरण में जाएं और उनसे ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर, ईश्वर के ध्यान साधना करें। इसी में मानव का कल्याण।

ॐ श्रीं आशुतोषाय नमः 

श्री सियाबिहारी जी ✍️

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