सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।
एक बार श्री आशुतोष महाराज जी से किसी ने पूछा- गुरु महाराज जी, हमारे शास्त्रों में समाज को चार वर्णों में विभाजित किया गया है। परंतु कुछ संत- महापुरुषों ने इस वर्गीकरण का विरोध किया है। तो महाराज जी ने जवाब दिया -एक बार एक कट्टरपंथी ब्राह्मण हमारे पास आए। उन्होंने हमसे कहा इस समाज में ईश्वर ने चार वर्णों की उत्पत्ति की है। इसलिए सभी को इस वर्ण व्यवस्था का सम्मान करना चाहिए। हमने उनसे पूछा -किस आधार पर ईश्वर ने वर्ण व्यवस्था की है। तो उन्होंने बताया कि ईश्वर के मुख से ब्राह्मण,भुजाओं से क्षत्रिय, उदर से वैश्य और पदों से शूद्र उत्पन्न हुए हैं। इसलिए ब्राह्मण उत्कृष्ट हैं और शूद्र निकृष्ट। तब महाराज जी ने कहा -यदि एक पिता के 4 पुत्र हो, तो उन पुत्रों की एक जाति होनी चाहिए। इसी प्रकार सब मनुष्यों का पिता एक परमेश्वर है, तो मनुष्य समाज में भी जाति भेद नहीं होना चाहिए। सभी एक समान ही है, ना कोई ऊंचा है, ना नीचा। जिस प्रकार शरीर के सब अंग महत्वपूर्ण है, उसी प्रकार इन अंगों से निसृत सभी मनुष्य भी समान रूप से महिमाशाली हैं।
यदि ईश्वर के चरणों से उत्पत्ति होने के कारण कोई निकृष्ट हो जाता है तो गंगा के विषय में आप क्या कहते हैं। क्योंकि हमारे शास्त्र कहते हैं -नारायण के श्री चरणों से गंगा जी की उत्पत्ति हुई। फिर इस गंगा को देवों के देव भगवान शंकर ने अपने शीश पर स्थान दिया। ऐसा क्यों किया उन्होंने?इसलिए यह कहना गलत है कि भगवान के चरणों से उत्पन्न होने के कारण शुद्र निम्न है। वास्तव में वर्णों की स्थापना गुण कर्म के आधार पर की गई थी ना किसी अन्य कारण से। ब्राह्मण वर्ग में वे व्यक्ति रखे गए जो चिंतनशील स्वभाव के थे। जो स्वभाव से पराक्रमी और साहसी थे उनको छत्रिय कहा गया। और जिनकी रूचि व्यवसाय में थी उन्हें वैश्य कहा गया। जिन लोगों की रूचि समाज सेवा मे थी उनको शुद्र कहा गया। जैसे कि इंजीनियर डॉक्टर आदि। जन्म के आधार पर किसी को शूद्र या ब्राह्मण नहीं कहा जा सकता।
यही बात आध्यात्मिक जगत में भी लागू होती है। जब हम पूर्ण गुरु से ब्रह्मज्ञान में दीक्षित होकर आंतरिक जगत में प्रवेश करते हैं तो हमारा सफर भी निम्न प्रवृत्तियों से उच्च चेतना की ओर होने लगता है। ध्यान साधना द्वारा हम जितना जितना अध्यात्मिक उन्नति को प्राप्त करते हैं, आंतरिक आकाश की ऊंचाइयों को छूते चले जाते हैं, उतना उतना हमारे मानसिक दायरे टूटते चले जाते हैं। हमारे मन की संकीर्ण सोच विराट होने लगती है। भेदभाव की सभी दीवारें खत्म हो जाती हैं। हम जान लेते हैं कि हम सभी उस एक परम पिता की संताने हैं। हममे कोई भेद नहीं। कोई ऊंच-नीच नहीं। एक पिता एकस के हम बारिक। इसलिए हमारे महापुरुषों ने जन-जन को ब्रह्म ज्ञान का उपदेश देकर आत्म उत्थान की ओर अग्रसर किया। जाति के नाम पर समाज को विघटित करना हमारा उद्देश्य नहीं, बल्कि सभी को आत्म- दर्शन करा कर एक सूत्र में बांध देना हमारा लक्ष्य है। क्योंकि तभी समाज में शांति की स्थापना हो सकेगी।
**ओम् श्री आशुतोषाय नम:**
"श्री रमेश जी"
