*गायत्री साधना के तीन रहस्य**

 सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।


                   ऊँ भूर्भुवः स्व: तत् सवितुर्वरण्यं

                            भर्गो देवस्य धीमहि

                          धियो यो न: प्रचोदयात

   यह गायत्री मंत्र है। यजुर्वेद में अंकित इस महामंत्र को भारतीय संस्कृति का मौलिक मंत्र माना गया है। आज बहुत सी संस्थाएं इस महामंत्र का प्रतिदन उच्चारण करने को ही प्राथमिकता देती हैं।

   किंतु यहाँ एक विचारणीय पक्ष है। क्या गायत्री मंत्र का केवल मौखिक उच्चारण करना पर्याप्त है?

   इन सैद्धांतिक प्रश्नों के उत्तर हम गुरुदेव श्री आशुतोष महाराज जी की प्रेरणा और तत्वज्ञान की दृष्टि से समझने की कोशिश करेंगे। सर्वप्रथम एक उपनिषदीय कथा पर दृष्टि डालते हैं।

आचार्य मैत्रेय ने ऋषि मौद्गल्य से निवेदन किया - "हे ऋषि वर, कृपा कर आप मुझे गायत्री मंत्र की प्रयोगात्मक साधना के विषय में बताएं। इस महामंत्र पर तप करने की विधि बताएँ।

   मैत्रेय के ऐसे निवेदित भाव सुनकर ऋषि मौद्गल्य उन्हें गायत्री मंत्र का वैज्ञानिक रहस्य समझाते हैं - गायत्री की प्रयोगात्मक साधना तीन चरणों में सम्पन्न होती है। 

प्रथम चरण--

'तत् सवितुर्वरेण्यमिति सावित्रया: प्रथम: पाद:।।'

   अर्थात वे परम परमेश्वर ब्रह्म, जो सूर्य की भाँति उज्जवल हैं, कांतिमय हैं, प्रकाशमय हैं - वे वरण करने योग्य हैं। यह साधना का प्रथम चरण है। इसीलिए तुम्हें भी सर्वप्रथम उस परम प्रकाशित ब्रह्म का अपने अंतर्जगत में वरण करना होगा। और तुम किसी का वरण तब कर सकते हो, जब उसका साक्षात्कार कर लेते हो। इसलिए ब्रह्मज्ञान के माध्यम से तुम्हें अपने भीतर ही इस प्रकाश रूप परमात्मा का दर्शन करना होगा।

  इसी उपदेश के साथ ऋषि मौद्गल्य ने मैत्रेय को ब्रह्मज्ञान की दीक्षा प्रदान की। तृतीय नेत्र जागृत कर ईश्वर को उनके भीतर प्रकट कर दिया। मैत्रेय ने सूर्य स्वरूप ब्रह्म को अपने अंतस् में धारण कर लिया।

द्वितीय चरण --

'भर्गो देवस्य धीमहीति सावित्रया द्वितीय:।।'

   अर्थात वह ज्योतिर्मय प्रकाश स्वरूप ईश्वर ध्यान करने योग्य है। अतः उसका ध्यान करो। यह गायत्री साधना का दूसरा चरण है। जो ब्रह्मज्ञानी साधक अपने जागृत तृतीय नेत्र पर प्रकट प्रकाश का नियमित ध्यान करता है, वही अपने वास्तविक लक्ष्य को प्राप्त कर पाता है।

तृतीय चरण--

'धियो यो न: प्रचोदयादिति सावित्रयास्तृतीय:।।'

   अर्थात हे प्रभु, हमारी बुद्धि को आप प्रकाशित करें। सन्मार्ग की ओर उसे अग्रसर करें। यह सावित्री गायत्री का तीसरा चरण है।

   अतः हे मैत्रेय, तुम ब्रह्मज्ञान की ध्यान साधना द्वारा अपनी चेतना को, मन बुद्धि को अंत:प्रकाश पर केन्द्रित करो और अपने भीतर दिव्यता अनुभव करो। तब देखना, तुम्हारी बुद्धि में, विचारों में सकारात्मकता व उज्ज्वलता प्रकट होगी। इसके बाद ही तुम्हारी तीन चरणों की गायत्री साधना प्रयोगात्मक दृष्टि से परिपूर्ण होगी।

    इसलिए गायत्री साधना हमें यही प्रेरणा देती है कि हम पूर्ण गुरु द्वारा ब्रह्मज्ञान में दीक्षित हो जाएँ। घट के भीतर प्रकाश पर निरंतर ध्यान लगाएँ। गायत्री मंत्र को केवल पढ़ने, कंठस्थ व उच्चारित करने तक ही सीमित न रहें। उसे तत्व से जीवन में धारण करें।

**ओम् श्री आशुतोषाय नम**

"श्री रमेश जी"

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