*ईश्वर से सामर्थ्य मांगे, ईश्वरत्व नहीं!*

         सर्व श्री आशुतोष महाराज जी की कृपा वर्षा

हम उस परमात्मा के अंश हैं जो अथाह ज्ञान राशि का स्रोत है। अंत: हमारे अंदर भी वही ज्ञान कोश समाहित है। तो फिर हमें क्यों हर कार्य को करने या सीखने के लिए मेहनत करनी पड़ती है? क्यों एक संगीतकार को घंटो रियाज करने के बाद संगीत का ज्ञान होता है? क्यों एक लेखक को अपने मस्तिष्क की हर एक तांत्रिका को निचोड़ कर कागज पर शब्दों को उतरना पड़ता है? क्यों एक मूर्तिकार अनवरत एक ही शीला पर महीनो हथौड़े व छैनियो का प्रहार करने के बाद ही एक सुंदर कृति का निर्माण कर पता है?... और  विद्यार्थी को क्यों साल दर साल इतनी मेहनत कर शिक्षा हासिल करनी पड़ती है? जब सारा ज्ञान हमारे भीतर पहले से ही है तो फिर हमें इतनी मेहनत क्यों करनी पड़ती है? 

उत्तरस्वरूप एक कहानी- एक बार एक राजकुमार अपने दरबारीयो के बच्चों के साथ लुकाछिपी खेल रहा था। राजा भी वहीं बैठकर खेल का आनंद ले रहा था। राजकुमार के सभी साथी छुप गए। राजकुमार उन्हें खोजने लगा। उसको अपने साथियों को ढूंढने में बहुत मुश्किल हो रही थी। बहुत देर तक वह इधर-उधर भाग दौड़ करता रहा। जब थक गया, तो अपने पिता यानी राजा के पास जाकर बोला-'अपने साथियों को ढूंढने के लिए मुझे इतना परिश्रम करने की क्या आवश्यकता है? आप तो राजा हैं और मैं राजकुमार। आपकी शाही समर्थ्य पर मेरा भी अधिकार है। यदि मैं इसका प्रयोग करूं, तो पल भर में मेरे सभी साथियों को सामने आकर खड़ा होना पड़ेगा'। राजा मुस्कुरा दिया। फिर राजकुमार को समझाते हुए बोला-अगर मैं तुम्हें वह अधिकार दे दूं, शाही समर्थ्य का प्रयोग करने दूं, तो इस खेल का सारा आनंद ही खत्म हो जाएगा। खेल खेलने का तो फिर कोई प्रयोजन ही नहीं रहेगा...।

हमारे भीतर सारे गुण और शक्तियां विद्यमान है। लेकिन वे सुषुप्त अवस्था में है। जब हम अभ्यास के शीला पर अपने आप को घीसते हैं, निरंतर प्रयास करते हैं, तब वह शक्तियां हमारे भीतर स्वत: ही जागृत होने लगती है। परिश्रम द्वारा जब उसकी प्राप्ति होती है, तब हमें आनंद की अनुभूति होती है। हमारा आत्मविश्वास बढ़ता है। जीवन का उद्देश्य समझ में आने लगता है। इसलिए ईश्वर ने हमें सब कुछ देकर भी हमसे छिपा रखा है। खोजना अपने प्रयासों द्वारा हमें है। यही इस खेल की खूबी है और इसी में आनंद है। 

इसलिए ईश्वर से यदि कुछ मांगना ही है, तो हम उनसे समर्थ्य मांगे। उत्साह मांगें। उनके चरणों में अटूट श्रद्धा और विश्वास मांगे। ताकि हम इस खेल को जीतकर उनकी प्रसन्नता के अधिकारी बन सके। 

ॐ श्रीं आशुतोषाय नमः 

श्री सियाबिहारी जी ✍️

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