*ब्रह्म- सकार या निराकार*

         सर्व श्री आशुतोष महाराज जी की कृपा वर्षा

आज का तार्किक वर्ग  अक्सर यह प्रश्न उठा देता है -कैसे कोई  अध्यात्म के  अवैज्ञानिक तथ्यों को मान लेता है? कैसे कोई यह मान लेता है की निराकार ब्रह्म सकार भी होता है?

इस कटाक्ष का प्रत्युत्तर इस दृष्टांत से मिलता है। एक बार श्री वल्लभाचार्य को या समाचार मिला की विजयनगर (कर्नाटक) मैं एक आध्यात्मिक महासभा का आयोजन किया गया है। इस महासभा में ब्रह्म के रूप को लेकर चर्चा होगी। समाचार प्राप्त कर श्री आचार्य भी सभा में पहुंच गए। यहां उन्होंने देखा कि काफी दिनों से विद्वान बहस कर रहे हैं की ब्रह्म सकार है या निराकार? जब समाधान निकलता नजर नहीं आया,तब वल्लभाचार्य जी सभा के मध्य खड़े होकर बुलंद स्वर में बोले-शास्त्रों के अनुसार ब्रह्म दोनों रूप में होता है। ब्रह्म रूपवान भी है और रूपातीत भी । ब्रह्म सकार और निराकार भी है। ब्रह्म के दो रूप हैं-सकल और सूक्ष्म, नश्वर और अविनाशी, सीमित और असीमित, स्थिर और गतिशील, प्रकट और अप्रकट। 

ईशोवास्यपनिषद् मैं वर्णित है-

*तदेजति तन्नैजति तद् दुरे तद्वन्तिके।*

*तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यत:।।*

-ब्रह्म चल भी है अचल भी है। ब्रह्म हमसे बहुत दूर भी है और हमारे पास भी है। ब्रह्म हमारे भीतर भी है और बाहर भी विद्यमान है। 

पाठकगणो! ब्रह्म का सकार एवं निराकार रूप वैज्ञानिक तथ्यों पर भी खरा उतरा है। आज विज्ञान भी यह मान चुका है-हर वस्तु के दो रूप होते हैं-एक पदार्थ दूसरा ऊर्जा। पदार्थ सकार रूप को दर्शाता है एवं ऊर्जा निराकार रूप का प्रतीक है। अतः यह स्पष्ट है कि अध्यात्म वैज्ञानिक तथ्यों के साथ या उद्घोष करता है कि ब्रह्म रूपातीत भी है और रूपवान भी है।

ॐ श्रीं आशुतोषाय नमः 

श्री सियाबिहारी जी ✍️

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