सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।
दौड़ में खरहे को हराने के बाद कछुआ इतना अतिउत्साहित हो गया कि एक दिन उसने एक चीते को भी चैलेंज कर दिया। चीते को लगा कि खरहा से जीतने के बाद इसको घमंड हो गया है। उसने कछुए का घमंड तोड़ने की ठान ली। चीता ने दौड़ के लिए चैलेंज स्वीकार कर लिया। उसने सोचा-"खरहा बेचारा गलती से सो गया था तब ना हार गया। मैं बिल्कुल नहीं सोऊंगा,सीधे लक्ष्य तक पहुंच कर ही दम लूंगा।"
अगले दिन दौड़ शुरू हो गई। चीता तो सबसे तेज दौड़ने वाला जानवर है। वह इतनी तेजी से दौड़ा कि पीछे कछुए का कहीं अता-पता ही नहीं था। एक वृक्ष के नीचे बैठकर वह पीछे की ओर देखने लगा। ठंडी-ठंडी हवा चल रही थी। कुछ ही देर में उसे कब झपकी लग गई पता ही नहीं चला। उधर कछुआ धीरे-धीरे चलते हुए उससे आगे बढ़ गया। एक दूसरा चीता, जिससे दौड़ में भाग लेने वाले चीते की गहरी दुश्मनी थी, यह पूरा दृश्य देख रहा था। कछुआ कुछ ही दूर गया होगा कि दूसरे चीते ने जाकर पहले चीते को झकझोर कर जगा दिया और बताया-"भाई, आप सो गए हैं? कछुआ आगे बढ़ गया है, जल्दी जाइए नहीं तो वह फिर जीत जाएगा।"
पहले चीते ने दूसरे चीते को इस सहयोग के लिए धन्यवाद दिया और उसने सरपट दौड़ लगा दी। कुछ ही समय में वह चीता लक्ष्य तक पहुंच गया और उसने विजय हासिल कर ली। दूसरा चीता जब पहले चीते को जगा रहा था तो यह देखकर एक बंदर को बड़ा आश्चर्य हुआ। आश्चर्य इसलिए हुआ कि दोनों चीते के बीच कट्टर दुश्मनी थी। अगले दिन वही बंदर उस दूसरे चीते के पास गया और उससे पूछा-"बड़े भैया, आप और दौड़ में शामिल चीते के बीच तो कट्टर दुश्मनी थी, फिर भी आपने उन्हें जगा कर उनका सहयोग क्यों किया?" इस पर दूसरे चीते ने जवाब दिया- "आपसी दुश्मनी इतनी भी गहरी नहीं होनी चाहिए कि कोई ऐरा-गैरा आकर उसका फायदा उठा ले।" यह सुनते ही बंदर वहीं बैठकर काफी देर तक सोचता रहा और दूसरा चीता घने जंगल की ओर चला गया।
**शिक्षा**
अपने, अपने ही होते हैं। हमें हर जनमानस के साथ प्रेम का भाव रखना चाहिए। किसी से वैर का भाव नहीं रखना चाहिए। एक दूसरे के साथ मतभेद हो सकता है, लेकिन कभी भी मनभेद नहीं रखना चाहिए।
**ओम् श्री आशुतोषाय नम:**
"श्री रमेश जी"
