**ईश्वर से जुड़कर ही जीवन जीने योग्य बनता है। अपना ईश्वर के प्रति कर्तव्य को पहचाने।**

 सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।

भौतिक प्रकृति, जो हमारे आपके दिखने में आती है, वो सतो, रजो, व तमोगुण के तत्वों में विस्तार है। अर्थात इन तीन गुणों से होने वाली क्रियाओं से जो भी परिस्थितियां बनती है, उन्हीं से ही भौतिक प्रकृति के सभी जीवों को सुख व दुख मिलते हैं। यह सभी सुख-दुख एक अवधि लेकर आते हैं और समय पूरा होने पर चुपचाप चले जाते हैं। प्रकृति में होने वाली सभी क्रियाओं से किसी जीव को सुख मिलता है और किसी अन्य जीव को दुख मिलता है। जैसे एक मरे हुए पशु से मनुष्यों को दुर्गंध मिलता है और पक्षियों, कौआ-गिद्ध आदि को सुगंध मिलता है।

     ईश्वर से जुड़कर ही जीवन जीने योग्य बनता है। साधारण मिट्टी जब मूर्ति में परिवर्तित हो जाती है तो वह पूज्य बन जाती है। हवन की लकड़ियां श्रेष्ठ तथा पूज्य होती है, जबकि बड़े-बड़े पेड़ आग की भट्ठी में झोंक दिए जाते हैं। अतः अपना ईश्वर के प्रति कर्तव्य को पहचानें। किसी पूर्ण गुरु के चरणों में समर्पित हो जाएं। उनके इंगित मार्ग पर चलकर ही कल्याण सम्भव है। कितनी विडम्बना है कि हम सांसारिक दृष्टि से धनवान को धनवान समझते हैं। वास्तव में वह सबसे बड़ा कंगाल है। धनवान तो वह है जिसके पास प्रभु नाम का खजाना है। उसके लिए जंगल में भी मंगल है और सांसारिक महल भी वीरान है बल्कि श्मशान है। सोचें, सही चयन करें और उचित आचरण करके निज जीवन सफल व सभ्य बनाएं।

**ओम् श्री आशुतोषाय नम:**

"श्री रमेश जी"

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