सोचता हूं ।

 

“धर्म” क्या है! किसी वस्तु का सुंदर, बड़ा, कीमती,दुर्लभ आदि होना क्या उस वस्तु का धर्म है? क्या कोई वस्तु यदि सुन्दर नहीं है या कीमती नहीं है तो वह वस्तु नहीं है? वास्तव में किसी वस्तु का धर्म वह है जिससे वहवस्तु“वस्तु”

कहलाती है, जिससे उस वस्तु का अस्तित्व/वजूद है। जैसे अग्नि अपनी “ज्वलनशीलता”धर्म के कारण ही अग्नि कहलाती है अन्यथा वह अग्नि नहीं। ऐसे ही यदि मनुष्य/इंसान में मनुष्यता/इंसा

नियत नहीं, आठों पहर ईर्ष्या, शिकायत,

क्रोध, लालच का माला-जाप ,तो वह मनुष्य नहीं अपितु मनुष्य के रूप में पशु 

है। किसी ने ठीक ही कहा है -

येषांनविद्या नतपो नदानं ज्ञानंनशीलंनगुणोनधर्म:।   तेमर्त्यलोकेभुवि भारभूता:      मनुष्यरुपेण मृगा: चरन्ति।।

              प्रस्तुतकर्ता 

    डाक्टर हनुमान प्रसाद चौबे 

                गोरखपुर।

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