सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।
अक्सर साधारण मनुष्य बुद्धि और विवेक में अंतर नहीं देखता। देखिये, संसार को जानने के लिए बुद्धि की आवश्यकता होती है। जिसके लिए हम अपने छोटे बच्चों को पहले नर्सरी स्कूल, प्राईमरी स्कूल, हाई स्कूल और कॉलेज में पढ़ने-लिखने के लिए भेजते हैं। लेकिन परमात्मा को जानने-समझने के लिए विवेक की जरूरत होती है, जिसके लिए अक्सर माता-पिता कुछ नहीं करते। जिसके परिणाम हम-आप देख ही रहे हैं। आए दिन खून, अपहरण, बलात्कार आदि का समाचार देखने सुनने को मिलता रहता है। मानवता तो बिल्कुल खत्म ही हो गया है। देखिये, यह विवेक-शक्ति किसी ब्रह्मनिष्ठ सद्गुरु के सान्निध्य में जाकर ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर निरंतर ध्यान साधना व सत्संग करने से ही जागृत होना आरंभ होती है।दूसरी बात, यह विवेक-शक्ति केवल मनुष्य योनि में ही विकसित हो सकती है, अन्य किसी भी योनि में नहीं। इसलिए हमें अपने जीवन में सत्संग को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाना चाहिए, ताकि हमारे बच्चों में आरंभ से ही शुभ संस्कार बनने लगें।
गीता में भगवान श्री कृष्ण ने काम, क्रोध, लोभ को नरक के 3 दरवाजे बताया है। हम अपने जीवन में शरीर की आवश्यकताओं से अधिक जो कुछ भी चाहते हैं, उसे आप काम ही मान कर चलें। फिर इन कामनाओं/इच्छाओं के निरंतर बढ़ते रहने से ही लोभ यानी दूसरे नरक का दरवाजा खुल जाता है। और मन में लोभ के बने रहने से क्रोध का आना एक आम बात हो जाती है। फिर क्रोध में अक्सर मनुष्य अपने शब्दों पर नियंत्रण नहीं रख पाता, जिसके फलस्वरूप हम आप समाज में आये दिन हिंसा देखते ही रहते हैं। यानी क्रोध में हिंसा का हो जाना स्वाभाविक ही होता है। इसलिए हमें आरंभ से ही भोग प्रेरित इच्छाओं से बचना ही होगा। अन्यथा एक के बाद एक नरक के दरवाजे अपने आप खुलते जाते हैं और हमें पता भी नहीं चलता। अक्सर सत्संग के अभाव में मनुष्य इतनी गहराई में जाता नहीं। इसपर हमें अपना चिंतन करना चाहिए...।
**ओम् श्री आशुतोषाय नम:**
"श्री रमेश जी"
