सर्व श्री आशुतोष महाराज जी की कृपा वर्षा
आज हम देखते हैं कि यह वाक्य अक्सर प्रयोग किया जाता है कि-किसी भी चीज की अति हानिकारक है। एक परिश्रमी के लिए जितना महत्व परिश्रम रखता है,
उतना ही महत्व विश्राम भी रखता है। नहीं तो उसका स्वास्थ्य संतुलन बिगड़ सकता है। अर्थात प्रत्येक कार्य की सिद्धि के लिए हमें ऐसे मार्ग की जरूरत पड़ती है, जो मध्य हो।
इसी बात को भगवान श्री कृष्ण ने भी गीता में अर्जुन से कहा-हे अर्जुन! जो अधिक भोजन खाता है या अनेक दिन उपवास करता है, जो बहुत सोता है या जागता रहता है, उसको योग या (परमात्मा )प्राप्त नहीं होता। जो उपयुक्त अहार और विहार करता है तथा जो यथा समय सोता और जागता है, योग ऐसे पुरुष का दुख मिटा देता है।
एक दिन गौतम बुद्ध के तपस्या स्थान के पास से होकर एक ग्वालिन निकली। वह एक गीत गाती चली जा रही थी, जिसका सार भाव था-' *बीणा की तारो को इतना ढीला मत छोड़ो कि उनसे आवाज ही न निकले तथा इतना भी मत कसो कि वह टूट ही जाएं।'* जब यह शब्द गौतम के कानों में पड़े तो उन्हें अपने भूल का पता लग गया। यह ग्वालिन संत सुजाता थी। उन्होंने गौतम से कहा 'राजकुमार! आप जंगल में रहकर के कठोर तप कर रहे हैं, अस्थि शरीर सूखाकर आहार बंद कर रहे हैं।' ये परमात्मा की प्राप्ति के तरीका नहीं है। इसके लिए तो ब्रह्मज्ञान ही एक मध्यम मार्ग है। ऐसा कहने के बाद उन्होंने गौतम बुद्ध को ब्रह्मज्ञान की दीक्षा प्रदान की, जिससे उन्हें परमात्मा का दर्शन हुआ। इसके बाद इसी मध्यम मार्ग का सहारा लेते हुए किस प्रकार बुद्ध ने निर्माण प्राप्त किया, यह तो हम सभी जानते हैं। अधिक कहने का क्या प्रयोजन?
ॐ श्री आशुतोषाय नमः
श्री सियाबिहारी जी ✍️
