*दिव्य आंतरिक कक्ष की विशेषता*

           सर्व श्री आशुतोष महाराज जी की कृपा वर्षा

हमारे जीवन में दो कक्ष होते हैं। पहली कक्ष स्थुल है-हमारा बाहरी संसार, हमारा घर, हमारा परिवेश और हमारे संबंध, जो सभी के लिए दृष्टिगोचर और सुलभ है। दूसरा कक्ष सूक्ष्म है-हमारा आंतरिक घर, जिसे शास्त्रों ने 'हृदय _गुहा या अंतर्जगत' कहा है। यह वह स्थान है, जो मस्तक पर आज्ञा चक्र में स्थित है, जहां आत्मा का निवास है। यह अत्यंत सूक्ष्म और संसार के लिए अगम्य है ‌। यहां पहुंचना केवल गुरु कृपा से ही संभव है। उस आंतरिक घर का द्वारा बंद है‌ और उसकी कुंजी गुरु के पास है। जब सद्गुरु अपने शिष्य को ब्रह्मज्ञान की दीक्षा प्रदान करते हैं, तभी वह अंतर्जगत  के सूक्ष्म द्वार में प्रवेश कर पता है।

इस आंतरिक कक्षा की विशेषताएं यह है कि यह जितना सूक्ष्म है, उतना ही सुरक्षित भी है। जब हमारी चेतना बाहरी संसार में रहती है, तो हमें विषय वासनाओं के आक्रमणों का सामना करना पड़ता है। परंतु जब हम ब्रह्मज्ञान के ध्यान द्वारा अपनी चेतना को इस आंतरिक कक्ष(अंतर्जगत) मैं स्थापित कर लेते हैं, तब हम पूर्णत:सुरक्षित हो जाते हैं। वहां कोई बिकार नहीं पहुंच सकता। कोई वासना परेशान नहीं करती। वहां केवल शांति ,निर्मलता, निश्चिलता और निर्भयता अनुभव होता है।

अतः प्रिया पाठको सद्गुरु के सानिध्य में जाए  ब्रह्मज्ञान को प्राप्त करे,  और अपने जीवन को आनंददायक बनाएं। 

ॐ श्री आशुतोषाय नमः 

श्री सियाबिहारी जी ✍️

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