सर्व श्री आशुतोष महाराज जी की कृपा वर्षा
*नाशा ध्यान दृष्टि भृकुटी मे, सुरती श्वास के माहि। ईश्वर देख्यो जात है, यामे संशय नाभि।।*
इस श्लोक के अनेक व्याख्याएं की गई हैं -विशेष कर हठयोग के संबंध मे। इसी को आधार बनाकर नशाग्र पर, भृकुटी पर, श्वासो एकाग्र करने वाले ध्यान पद्धतियां प्रचलित हो गई। इन ध्यान- क्रियो के प्रचारकों ने इनके बल पर 'ईश्वर देख्यो जात है'के जोरदार दावे किए। उनका आज भी कहना है कि यदि हम- इन माध्यमों से ध्यान -साधना करेंगे, तो नि:सन्देह दीर्घकालीन प्रयासों के बाद ईश्वर का दर्शन सुलभ हो जाएगा।
प्रिया पाठकगणो! इसमें कोई संशय नहीं है कि सुक्तदेव की उक्ति एक आध्यात्मिक सत्य को उजागर करती है। यह भी सही है की दृष्टि में और सुरति श्वास में रखकर ध्यान करना साधना एक शाश्वत विधि है। परंतु केवल इन क्रियो के आधार पर ईश्वर -दर्शन होने का दाव करना अतिशयोक्ति है। ईश्वर का दर्शन अथवा साक्षात्कार कब होता है? तभी, जब समय के पूर्ण गुरु हमारी भृकुटी में स्थित तृतीय नेत्र को जागृत कर देते हैं। इसके अभ्यास के लिए लंबे अंतराल तक प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती। यह दिव्य दर्शन गुरु द्वारा ब्रह्मज्ञान की दीक्षा प्राप्त होते ही हो जाता है।
ॐ श्री आशुतोषाय नमः
श्री सियाबिहारी जी ✍️
