*गुरु के करुणा और महानता दिव्य है।*

          सर्व श्री आशुतोष महाराज जी की कृपा वर्षा

क्यों गुरु और शिष्य के बीच भी यही मीठा सा रिश्ता नहीं पनपता? शिष्य भी रोता है, बिलखता है, प्रश्न करता है अपने गुरुदेव से की क्यों? जब- जब भी मुझे आपकी सबसे ज्यादा जरूरत महसूस होती है, तब- तब आप मुझे क्यों दूर खड़े नजर आते हैं? आखिर क्यों? परंतु तब  एक साधक को समझ जाना चाहिए कि गुरुदेव की दूरी में भी उनकी अत्यंत समीपता छपी है। उनकी कठोरता में भी उनका ममत्व छिपा है। उनकी नाराजगी में भी हमारी ही भलाई छपी है। वे हमें कुछ बना देना चाहते हैं, हमें गढ देना चाहते हैं, एक सुंदर आकर देना चाहते हैं, हमें सफलता के शिखरो पर देखना चाहते हैं। तभी वे हम पर अपना निर्माण- कार्य जारी रखते हैं।

कभी प्रेम से तो कभी कठोरता से, कभी नजदीक रहकर तक कभी दूरी बनाकर। जब उनकी नजर परख लेती है कि हमारे पैरों में खुद-ब-खुद चलने की शक्ति आ गई, तब वह दूरी बनाते हैं। हमें वेखौफ, बिना सहारे चलने के लिए हमारी पीठ थपथपाते हैं। जब उनकी नजर देख लेती है कि हम जिंदगी की साइकिल को खुद संतुलित कर सकते हैं, तब वे  पीछे हट जाते हैं और हमें जिंदगी में पूरी रफ्तार से आगे बढ़ाने को प्रोत्साहित करते हैं। 

और जहां श्रेय लेने की बात है, वहां भी वे सदा छः कदम पीछे दिखते हैं क्योंकि अपने शिष्य को आगे रखना ही उनका स्वभाव है। उनकी करुणा और महानता है। वाह! ऐसी करुणा के सदके! ऐसी अनुपम दया के सदके! 

ॐ श्री आशुतोषाय नमः 

श्री सियाबिहारी जी ✍️

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