सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।
शास्त्रों में सभी जीवों, यानी आत्माओं को परमात्मा का ही अंश बताया गया है। लेकिन केवल मनुष्य योनि पाकर ही जीव परमात्मा को जानने की जिज्ञासा रख सकता है। अन्य किसी भी योनि में ऐसा अवसर नहीं दिया गया है। ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर निरन्तर ध्यान साधना व सत्संग करते रहने से हमारी अज्ञानता का पर्दा हटने लगता है। फिर लिया हुआ ज्ञान ही मन में टिकता है, जो जीव को भगवान की भक्ति में लगाता है। भक्ति करने से ही आवरत आत्मा से रजो व तमो का मल हटने लगता है, जिससे शुद्ध आत्मा अपने मूल स्वरूप में लौटने लगती है। यही मनुष्य जीवन की हमारी शुद्ध कमाई है, जो अगली मनुष्य योनि में बिना किसी परिश्रम के अपने आप ही मिल जाती है। अर्थात हमारी आध्यात्मिक यात्रा कभी बेकार नहीं जाती।
सर्व प्रथम हम सभी मनुष्यों को मन से स्वीकार करना चाहिए कि वर्तमान जीवन में मिली हुई सभी अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियां यानी सुख और दुख हमारे द्वारा ही किए गए कर्मों का फल है। किसी अन्य दूसरे तीसरे मनुष्य का नहीं। फिर भी हम सभी मनुष्यों को इस योनि में आध्यात्मिक उन्नति करने का एक अवसर है। इसलिए हमें मिले हुए जीवन में अपने कर्तव्यों को प्रसन्नता पूर्वक निभाते हुए परमात्मा का चिंतन करते रहना चाहिए। और अपनी प्रार्थना में सदा ही प्रभु का धन्यवाद करना चाहिए, न कि अपनी कामना रखनी चाहिए।
**ओम् श्री आशुतोषाय नम:**
"श्री रमेश जी"
