कुरुक्षेत्र के युद्ध क्षेत्र में जब मोह ग्रस्त पांडव अर्जुन निश्चित श्रेय के लिए शिक्षा हेतु शरणागत हुए तब हंसते हुए से भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा —अर्जुन! तू न शोक करने योग्य मनुष्यों के लिए शोक करता है और ज्ञानियों के वचनों को कहता है कि मैं तीनों लोकों के राज्य सुख को नहीं चाहता पृथिवी के लिए तो कहना ही क्या? अपने ही परिवार को मारकर हम कैसे सुखी होंगे?इन पापियों को मारने से तो पाप हो लगेगा। युद्ध से कुलनष्ट,कुलनष्टसे सनातनधर्म नष्ट, तबकुल स्त्रियां प्रदूषित,वर्णसंकर उद्भव और तब अनियत कालीन नरक वास इत्यादि। लेकिन अर्जुन! जो लोग मर चुके हैं उनके लिए और जो लोग अभी जीवित हैं उनके लिए भी ज्ञानी जन शोक नहीं करते।न तो ऐसा ही है कि मैं किसी काल में नहीं था,तू नहीं था अथवा ये युद्ध में उपस्थित राजा लोग नहीं थे और न ऐसा ही है कि इससे आगे भविष्य में हम सब नहीं होंगे, क्योंकि, अर्जुन! जैसे जीवात्मा की इस शरीर में बचपन, जवानी और बुढ़ापावस्था होती है वैसे ही दूसरे शरीर की प्राप्ति भी होती है। अतःउसविषयमें ज्ञानी पुरुष मोहित नहीं होते, चिंता नहीं करते।–
देहिनोs स्मिन्यथादेहे कौमारंयौवनंजरा।
तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्रनमुह्यति।।
अध्याय २,श्लोक १३
प्रस्तुतकर्ता
डाक्टर हनुमान प्रसाद चौबे
गोरखपुर।
