सर्व श्री आशुतोष महाराजजी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।
धर्म का असली अर्थ है, जिसे स्वयं में धारण करके स्वयं के जीवन को भी सुखी बनाया जाए। और प्रकृति के अन्य सभी जीवों का भी सुख सुनिश्चित किया जाये। अर्थात् अन्य किसी भी जीव को पीड़ा न हो। क्योंकि अपने सुख के लिए दूसरे किसी भी जीव को किसी भी प्रकार का कष्ट देना ही अधर्म है। मनुष्य योनि में किये गये ऐसे सभी पापों का भविष्य में दुख मिलना निश्चित रहता है। इसलिए हम सभी मनुष्यों को मिले हुए वर्तमान जीवन में अपने-अपने कर्तव्यों का पालन यानी अपने धर्म का पालन सभी अनुकूल प्रतिकूल परिस्थितियों में अवश्य ही करते रहना चाहिए।
आज के समाज में प्रायः ऐसा देखा जाता है कि एक साधारण मनुष्य वहीं बैठना पसंद करता है, जहाँ उसके अपने अहंकार को भोजन मिलता है। लेकिन जो हमारा अहंकार तोड़ देता है, वहाँ हम उठना बैठना पसंद ही नहीं करते। इसी कारण सत्संग करने से प्रायः हम सभी के अपने-अपने अहंकार को चोट लगने लगती है। इसीलिए अक्सर ऐसा देखा जाता है कि अमीर मनुष्य सत्संग में कम नजर आते हैं। क्योंकि सत्संग में ऐसे लोगों के अहंकार को भोजन नहीं मिलता। लेकिन ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर निरंतर ध्यान साधना व सत्संग करते हैं तो हमारा अहंकार कम होने लगता है। निरंकार का प्रकाश हमारे जीवन में प्रवेश करता जाता है।
**ओम् श्री आशुतोषाय नम:**
"श्री रमेश जी"
