सर्व श्री आशुतोष महाराजजी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।
संसार में आते ही इंसान को काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार आदि विकार बुरी तरह से जकड़ लेते हैं। चिंतारूपी नागिन उसे हर पल डसती रहती है। इसमे वृद्धा जरा की प्रतीक है जिसके भय से इंसान भागता रहता है। काल भयानक अजगर का प्रतीक है जो प्रतिपल जीव को अपना भोजन बनाने के लिए तैयार रहता है। छ: मुख वाला छ: त्रृतुएँ हैं। काले व सफेद चूहे दिन और रात का प्रतीक है जो मनुष्य के जीवन रूपी वृक्ष को धीरे धीरे खत्म करते चले जा रहे हैं। इस संसार के भीतर जीव का मुख्य उद्देश्य प्रभु को मिलना है। परन्तु काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंरूपी भयानक पशु इसको मार्ग से अलग कर देते हैं। यह अपने गंतव्य तक न पहुंच कर चौरासी लाख योनियों में जाने को विवश हो जाता है।
गुरुवाणी मे कहा गया है---
"जननी जानत सुतु बड़ा होत है,
इतना कु न जानै जि दिन दिन अवधा घटतु है।"
एक माँ अपने बच्चे का जन्मदिन मनाती है तो अपनी सखियों से खुश होकर कहती है कि आज मेरा पुत्र 10 वर्ष का हो गया है। परंतु मां यह नहीं जानती कि उसका बेटा10 वर्ष और मृत्यु के निकट चला गया है। क्षण-प्रति-क्षण हम मृत्यु के शिकार हो रहे हैं।
यह जीव चौरासी लाख योनियों में भटक रहा था।
प्रभु ने कृपा करके उस बंधन से स्वतंत्र कर दिया और मां के गर्भ में वास दिया। वहां यह उल्टा लटका हुआ प्रभु के समक्ष प्रार्थना करने लगा। जैसे हम देखते हैं कि जब एक शिशु का जन्म होता है तो वह रोता है। किंतु क्या हमने कभी विचार किया कि उसके रोने का कारण क्या है?
बच्चा अपने जन्म से पहले प्रभु की ज्योति का ध्यान कर रहा होता है। जब जन्म होता है तो उसका ध्यान भंग हो जाता है। ध्यान भंग हो जाने के कारण बच्चा रोने लगता है।
परमात्मा ने जीवात्मा को श्वांसों की पूंजी देकर संसार में भेजा, पर निर्णय उसने जीवात्मा पर छोड़ दिया कि वह उसका उपयोग किस तरह से करे। यदि हम इन श्वांसों की पूंजी को प्रभु भक्ति में न लगाकर यूं ही संसार में व्यर्थ गंवा देते हैं, तब पश्चाताप के अतिरिक्त हमारे हाथ में कुछ भी नहीं रह जाता। किंतु जो संत (गुरु) का सान्निध्य पाकर अपनी श्वांसों की पूंजी को प्रभु की भक्ति प्राप्त करने में लगा देता है वह मृत्यु पर विजय प्राप्त कर लेता है। ईश्वर उसको भवसागर से पार लगा देते हैं।
**ओम् श्रीआशुतोषाय नम:**
"श्री रमेश जी"
