अक्सर लोग अपनी जीवन गाड़ी मनोबल से ही चलाते हैं। परन्तु जीवन की दौड़ में कुछ ऐसे पल भी आते हैं, जब मनोबल कमजोर होने लगता है। मनोबल के कमजोर होते ही हम आत्म हीनता की खाइयों मे लुढ़क जाते हैं। मन के निर्बल होने पर बुद्धि भी दामन झटक देती है और व्यक्ति भयंकर रूप से इन्द्रियों के अधीन हो जाता है।
इस गिरते हुए मनोबल को बढ़ाने का एक सशक्त मंत्र है- उत्साह पूर्ण विचारों का भरपूर सहारा लें। प्रत्येक व्यक्ति में कोई न कोई योग्यता होती है। आवश्यकता है तो बस उस योग्यता को पहचान कर प्रयोग में लाने की।
मनोबल का मूल स्रोत व्यक्ति की अंतरात्मा होती है। इसलिए इसे निश्चित तौर पर आत्मा से संबंधित रखना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति ब्रह्मज्ञान को प्राप्त कर उसका निरंतर अभ्यास करता है तो उसके संकल्पों में दृढता आती है। जिससे असाध्य कार्य भी साध्य हो जाते हैं।
उदाहरण के रूप में- जब वानरों द्वारा मां सीता की खोज अभियान में एक ऐसा पड़ाव आता है जब सभी वानर अपना मनोबल गिराकर उपवास का निर्णय लेते हैं। किंतु उसी क्षण सागर तट पर उदास बैठे हनुमानजी को जामवंतजी आत्मस्मृति करवाते हैं। उन्हें याद दिलाते हैं कि उनमें कौन-कौन सी दिव्य शक्तियां निहित हैं।
इस प्रकार हनुमानजी को जब स्वयं का ज्ञान होता है तो उनका मनोबल बढ़ जाता है।उनके उत्साह को देख कर शेष वानरों में भी उर्जा का संचार होता है। यानि सूत्र वही है- स्वयं को जानना। अपनी आत्मशक्ति को पहचानना और उसका वरण करके मनोबली हो जाना।
अत: अध्यात्म में जुड़कर ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर आत्मा को जानें। जो किसी ब्रह्मनिष्ठ गुरु द्वारा ही प्राप्त होता है। आत्मा- जो कि परमात्मा का स्वरूप है। आत्मतत्त्व को जानने के बाद ही हम परमात्मा को जान सकते हैं, पा सकते हैं।
**ओम् श्री आशुतोषाय नमः**
"श्री रमेश जी"
