सर्व श्री आशुतोष महाराजजी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।
मनुष्य को यह तन प्रभु प्राप्ति के लिए मिला है। बांकि जितने भी कार्य मानव करता है, उनसे मानव जीवन का उद्देश्य सिद्ध नहीं होता।इसलिये वे सभी कार्य व्यर्थ हैं। अतः मनुष्य को चाहिए कि वह संतों की शरणागति होकर प्रभु भक्ति की प्राप्ति करे।
एक बार एक अंधा व्यक्ति ऐसे किले में चला गया जिसके चौरासी द्वार थे। वह व्यक्ति उस किले से निकलना चाहता था लेकिन उसे मार्ग नहीं मिल रहा था। तभी एक व्यक्ति उधर से गुजरा। उस व्यक्ति ने अंधे व्यक्ति को बताया कि यहां सभी द्वार बंद हैं, बस एक ही द्वार खुला हुआ है। मैं तुम्हे दीवार के पास छोड़ देता हूँ, तुम हाथ से दीवार को छूते हुए चलते जाना और खुला द्वार आते ही बाहर निकल जाना। अंधा व्यक्ति दीवार को छूते हुए चलने लगा। जैसे ही खुला द्वार आया उसे खुजली होने लगी। उसने दीवार से हाथ हटाया और शरीर पर खुजली करता हुआ आगे बढ़ गया।और इतने में वह खुला द्वार पीछे छूट गया। अब उसके आगे फिरसे चौरासी दरवाजे थे जिनको पार करने के बाद ही खुला द्वार मिल सकता था।
ठीक यही अवस्था इस जीव की भी है, जिस पर कृपा कर परमात्मा ने मानव तन दिया। किंतु वह अपने जीवन के उद्देश्य को पूर्ण नहीं करता, और यदि कभी करता भी है तो उसे वासना रूपी खुजली होने लगती है। इस प्रकार खुजलाने मे ही उसका समय नष्ट हो जाता है, जिससे उसको फिरसे चौरासी लाख योनियों के चक्कर लगाने पड़ते हैं। ऐसे में कभी वह अपने कर्मों को तो कभी समय और ईश्वर पर मिथ्या दोषा-रोपण करता है।
**ओम् श्रीआशुतोषाय नमः**
"श्री रमेश जी"
