**गुरु की दृष्टि शिष्य के लिए दूध और रोटी है।**

 सर्व श्री आशुतोष महाराजजी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।

एक बार एक स्वामी भैया गुरुदेव श्री आशुतोष महाराज जी से भाव पगे स्वर में बोले- "महाराज जी, हनुमान जी ने तो सभी अयोध्यावासियों के साम दिया था कि उनके हृदय में उनके प्रभु राम बसते हैं। पर यदि कोई हमसे पूछेगा कि तुम्हारा तुम्हारे गुरु के प्रति कितना प्रेम है, तो हम कैसे बता पाएँगे? हममें तो हनुमंत जैसा सामर्थ्य नहीं है।"

    तब महाराज जी ने उनके शीश को सहलाते हुए कहा- "तुम अपने महाराज जी से कितना प्रेम करते हो, यह प्रमाणित करने के लिए तुम्हें हृदय खोलकर दिखाने की जरूरत नहीं है। तुम्हारा आचरण, तुम्हारा व्यक्तित्व इसकी गवाही देगा। कब? जब तुम्हारा हर शब्द और हर कर्म गुरु के सिद्धांतों के अनुरूप होगा। तुम्हारे चलने फिरने, उठने बैठने, सोने जागने, खाने पीने, हँसने खेलने.. सब गुरु के आदर्शों की अभिव्यक्ति होगी। तब तुम्हें दुनिया को बताना नहीं पड़ेगा कि तुम्हारे हृदय में कौन विराजमान हैं? तुम्हें देखते ही उन्हें तुम्हारे गुरु का दर्शन स्वत: हो जाएगा।"

सचमुच में भगवत प्रेमियों, गुरु का मिलना और अपने शिष्य को प्रेमपूर्वक देखना- शिष्य की जन्म-जन्मांतरों की भूख शांत कर देता है। गुरु की दृष्टि शिष्य के लिए दूध और रोटी है।


**ओम् श्री आशुतोषाय नम:**


"श्री रमेश जी"

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