*'ध्यान' की प्रक्रिया 'ध्येय'और 'ध्याता' के मिलन से घटती है।*

          सर्व श्री आशुतोष महाराज जी की कृपा वर्षा


सनातन ध्यान पद्धति' के सफल नतीजे की नकल करने के चक्कर में कई पंथो का निर्माण हो गया है। क्योंकि वास्तव में ध्यान के नाम पर जो नकली क्रियाएं की जाती है, वे  अपर्याप्त होती हैं। आजकल कई प्रचलित ध्यान पद्धतियां हैं, जैसे की फोकस कम्पैशन(संवेदना), ब्रीदिंग (श्वास), मंत्र चक्र और ऐसी कई हजारों और भी। इन ध्यान- पद्धतियों मैं आंख मूंद कर, हाथों की उंगलियों को ज्ञान -मुद्रा में जोड़कर, कमर सीधी तान कर आज जिज्ञासु जन बैठ तो रहे हैं; पर उनका ऐसा करना ध्यान की प्रक्रिया की बाहरी नकल करना भर है। मन और आत्मा के स्तर पर सारी पद्धतियां सरासर नाकाम ही रह जाती है।

यदि कोई समझ ले की विद्युत यंत्र (पंखा ,बल्ब,आदि) को चलाने के लिए सिर्फ उसकी तार को 'स्विच'मे डालकर ऑन कर देना होता है, तो यह आधारहीन सच होगा! क्योंकि जब तक स्विच का विद्युत से कनेक्शन नहीं होगा, तब तक विद्युत- उपकरण काम नहीं करेगा। ठीक  वैसे ही, आंखें मुंद कर ध्यान मुद्रा में बैठने से कुछ हाथ नहीं लगेगा जब तक आदि- तरंगों (परम अलौकिक) से नाता स्थापित नहीं होगा, तब तक ध्यान का कोई औचित्य सिद्ध नहीं होगा और न ही वह हितकर साबित होगा। इसी संदर्भ में *श्री गुरु आशुतोष  महाराज जी* सटीक समाधान देते हुए आर्ष ग्रन्थों के निचोड़ को बड़ी सरलता से समझते हैं। वह कहते हैं, 'ध्यान' की प्रक्रिया 'ध्येय'और ध्याता के मिलन से घटती है; जहां ध्याता 'हम' और ध्येय वह 'परम अलौकिक'शाश्वत सत्ता'होती है, जिसको 'निराकार ब्रह्म' भी कहते हैं। इस संपूर्ण प्रक्रिया का शुरुआत 'दिव्य -चक्षु(तृतीय नेत्र) के खुलने से ही प्रारंभ होती है, जो ब्रह्मज्ञान की दीक्षा के दौरान जागृत होता है। फिर जब  हम उसे दिव्य नेत्र की मदद से निराकार ब्रह्म का प्रकाश रूप में दर्शन होता है और आदि नाम की तरंगों का मेरुदंड के भीतर प्रवाह होता है, तदोपरांत ध्यान  की वास्तविक प्रकिया हमारे भीतर शुरू होती है।

तो आइए हम सनातन प्रक्रिया को अपने अंतःकरण में घटित करने के लिए ब्रह्मज्ञान में दीक्षित होएं।

ॐ श्री आशुतोषाय नमः 

श्री सियाबिहारी जी ✍️

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