सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।
सभी मनुष्यों में 5 विकार काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार होते हैं। मनुष्य योनि में ही हम अपने इन विकारों को कमजोर या समाप्त कर सकते हैं। यह विकार ही हमारी जीवन रूपी नैया को माया रूपी सागर में डुबोते हैं, जिनके कारण हमारी आध्यात्मिक उन्नति हो नहीं पाती। और हम भगवान को पाने का एक सुनहरा अवसर फिर से खो देते हैं। अत: हमें कभी भी इन विकारों के वशीभूत नहीं रहना चाहिए। एक सच्चे संत की खोज करनी चाहिए। और उनसे ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर निरन्तर ध्यान साधना व सत्संग करते रहना चाहिए। मानव जीवन अनमोल है, इसपर विचार करें।
मनुष्य योनि हमें आध्यात्मिक उन्नति करने के लिए ही मिली है। अर्थात आवृत आत्मा को शुद्ध करने के लिए ही मिली है। यह आवृत आत्मा उतने अनुपात में ही शुद्ध होती जाती है, जितने अनुपात में कारण शरीर में तमोगुण व रजोगुण का मल समाप्त होता जाता है। फिर मरते समय तक, की गई शुद्ध आत्मा दोबारा से अशुद्ध नहीं होती। अर्थात पुन: मनुष्य योनि पाते ही वही शुद्ध आत्मा की स्थिति में आगे नई आध्यात्मिक उन्नति के लिए दोबारा मिल जाती है।
भौतिक प्रकृति में जन्म लिए हुए सभी मनुष्यों के स्थूल शरीर एक दिन मृत्यु को अवश्य प्राप्त होते हैं। यदि इंसान अपने जन्म और भविष्य में होने वाली मृत्यु पर ही गहरा विचार /चिंतन करता जाए, तो बीच का समय यानी बीत रहा वर्तमान जीवन अपने आप ही समझ में आ जाता है। और मनुष्य को संसार से सहज ही वैराग जागने लगता है। मनुष्य सत्य यानी भगवान से जुड़ जाता है। अर्थात मिला हुआ मनुष्य जन्म सफल और सार्थक हो जाता है।
**ओम् श्री आशुतोषाय नम:**
"श्री रमेश जी"
